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विदेशों में डाक्टरी पढ़ाई के किंतु-परंतु

राकेश कोछड़
हाल ही में यूक्रेन युद्ध में एक भारतीय छात्र की मृत्यु ने वहां फंसे हजारों भारतीय छात्रों की मुश्किलों की ओर ध्यान खींचा है। भारत से विदेश जाकर मेडिकल की पढ़ाई करने वालों में एक बड़ी तादाद यूक्रेन जाती है, हालांकि, रूस और चीन सबसे पसंदीदा जगहें हैं। काफी विद्यार्थी किर्गिज़स्तान, नेपाल, बांग्लादेश और फिलीपींस भी पढऩे जाते हैं।
भारत में फिलहाल 605 मेडिकल कॉलेज हैं, जिनकी एमबीबीएस कोर्स में सालाना भर्ती क्षमता 90,825 है। लगभग आधे मेडिकल कॉलेज सरकारी हैं तो बाकी निजी अथवा किसी ट्रस्ट/सोसायटी द्वारा संचालित हैं। सरकारी मेडिकल कॉलेजों में एमबीबीएस कोर्स की वार्षिक फीस 1०० रुपये से कम (एम्स) से लेकर 1.5 लाख रुपये (केरल) है, लेकिन निजी कॉलेजों में पूरे कोर्स के 83 लाख (मुलाना) से 1.15 करोड़ (डीवाई पाटिल मेडिकल कॉलेज, नवी मुंबई) तक लगते हैं।

मेडिकल शिक्षा पाने को विद्यार्थी विदेशों का रुख क्यों करते हैं? देशभर में कुल मिलाकर उपलब्ध लगभग 90 हजार सीटों के लिए इस साल नीट (एनईईटी) प्रवेश परीक्षा में लगभग 15 लाख छात्रों के बैठने का आकलन है। विभिन्न किस्म का आरक्षण कोटा और निजी कॉलेजों में ऊंची फीस के चलते जिन उम्मीदवारों ने 35000 जैसा ऊंचा स्कोर पाया हो, उन्हें भी सीट नहीं मिल पाती, जबकि कोई कम नंबर पाकर भी डीम्ड यूनिवर्सिटी से या प्रबंधन कोटे के तहत प्रवेश पा लेता है। जो छात्र निजी कॉलेजों में प्रवेश पाने की आर्थिक हैसियत नहीं रखते, उन्हें विदेश जाना पड़ता है क्योंकि वहां पूरे कोर्स का खर्चा 20-30 लाख रुपये आता है। इनके अलावा एक श्रेणी वह है, जिसने न तो नीट पास किया या फिर स्थान इतना निचला पाया कि स्वदेशी मेडिकल कॉलेज में भर्ती नहीं हो पाती।

वर्ष 2002 में टीएमए पई मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला दिया था कि जो निजी शैक्षणिक संस्थान सरकार से अनुदान नहीं लेते, वे अपने मुताबिक व्यावसायिक कोर्स फीस निर्धारित करने को स्वतंत्र हैं। इसके बाद हर राज्य में फीस निर्धारण समिति का गठन हुआ, जिसके पास यह अधिकार था कि तात्कालिक बुनियादी ढांचे और विस्तार योजना इत्यादि को ध्यान में रखते हुए फीस निर्धारण करे। इसका उद्देश्य चंदा-भर्ती को हतोत्साहित और मेरिट को बढ़ावा देना था। बदनाम रहे मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया की जगह बनाए गए राष्ट्रीय मेडिकल आयोग ने पिछले साल नवम्बर माह में निजी मेडिकल कॉलेज में 50 फीसदी सीटों पर फीस निर्धारित करने का सुझाव दिया था। प्रत्येक ऐसे संस्थान को 50 प्रतिशत सीटें मेरिट (नीट रैंक) के आधार पर देनी होंगी, जिसके लिए सालाना फीस 6-10 लाख होगी। बाकी की सीटें प्रबंधन कोटे की रहेंगी, जिनकी वार्षिक फीस 15-18 लाख ले सकेंगे। डीम्ड यूनिवर्सिटी में वार्षिक फीस 25 लाख तक हो सकती है। वर्ष 2016 तक निजी कॉलेजों के लिए कोर्स गैर-मुनाफा आधार पर चलाना अनिवार्य था। लेकिन सरकार ने इस धारा को हटा दिया और हर साल 10 प्रतिशत फीस बढ़ाने को मंजूरी दे दी।

साथ ही विदेशों में प्रशिक्षण प्राप्त डॉक्टरों को भारत में प्रैक्टिस करने के लिए पंजीकरण करवाने और फॉरेन मेडिकल ग्रेजुएट एग्ज़ामिनेशन (एफएमजीई) परीक्षा पास करने पर भारतीय मेडिकल कॉलेजों में स्नातकोत्तर शिक्षा प्राप्त करने की अनुमति भी दे दी। हालांकि, पिछले पांच सालों में एफएमजीई उत्तीर्ण करने वालों का प्रतिशत 16 रहा है। संसदीय कार्य मंत्री प्रह्लाद जोशी ने हाल ही में कहा था कि विदेशों से मेडिकल पढ़ाई करने वालों में 90 फीसदी भारत में योग्यता परीक्षा उत्तीर्ण करने में असफल रहते हैं। यह कथन जहां एक ओर वहां करवाई पढ़ाई का घटिया स्तर दर्शाता है वहीं छात्रों की योग्यता भी बतलाता है जो नीट परीक्षा में निचला स्थान पाने के बावजूद किसी भी हील-हवाले से मेडिकल डॉक्टर बनने की चाहत रखते हैं। इसीलिए हर साल विदेशी मेडिकल शिक्षा प्राप्त लगभग 3०० डिग्रीधारकों में 5000 से भी कम वैध मेडिकल प्रैक्टिस करने की प्रामाणिकता रखते हैं, शेष को या तो दुबारा इम्तिहान पास करना पड़ता है या छोटी जगहों पर अवैध प्रैक्टिस करने लगते हैं, या फिर कोई और व्यवसाय चुन लेते हैं। लिहाजा स्नातकोत्तर डॉक्टर बनने की संभावना बहुत कम होती है।

भारत में मेडिकल कॉलेज सीटें बढ़ाने के सुझाव आते रहते हैं। देश में प्रत्येक 1000 लोगों के पीछे 1 डॉक्टर होने की सिफारिश के हिसाब से लगभग 13 लाख 80 हजार डॉक्टर होने चाहिए। जबकि देश में रजिस्टर्ड एलोपैथ डॉक्टरों की संख्या 10 लाख 20 हजार है। पिछले 8 सालों में, देश में एमबीबीएस सीटें 51,500 से बढक़र 90,000 हो गई हैं। विशेषज्ञों के बीच यह बहस आम है कि क्या इनकी संख्या और बढ़ाई जाए या नहीं। सीटें बढ़ाने के लिए न केवल अतिरिक्त बुनियादी ढांचे में बल्कि माकूल सुविधाओं में बढ़ोतरी करने की जरूरत होती है। अगर इस इजाफे के बाद आर्थिक रूप से वहन योग्य सीटें बहुत कम बढ़ पाईं तो यह समस्या को आगे गहराने जैसा होगा।

अन्य गंभीर मुद्दा जिस पर ज्यादा चर्चा नहीं होती, वह यह कि एमबीबीएस डिग्री पाने में खर्च हुए 50 लाख से 1 करोड़ रुपये के बाद कमाई कितनी होती है। एक एमबीबीएस डॉक्टर को निजी अस्पताल में मासिक वेतन लगभग 30-40 हजार मिल पाता है (निजी क्लीनिक चलाकर ज्यादा भी कमा सकता है) और सरकारी नौकरी में वेतन लगभग दोगुणा है। अपनी शिक्षा पर लगाए पैसे को पूरा करने के लिए कुछ डॉक्टर अनुचित तरीके अपनाते हैं। कुछ साल पहले, ब्रिटिश मेडिकल जर्नल में भारत में सरकारी नौकरी कर चुके आस्ट्रेलियन डॉ. डेविड बर्जर का किस्सा छापा था, शीर्षक था : ‘हाउ क्रप्शन रूइन्स द डॉक्टर-पेशेंट रिलेशनशिप इन इंडिया-2014’। डॉ. बर्जर यह देखकर हैरान थे कि उच्च रक्तचाप जैसे आम लक्षण वाले मरीज को भी हर तीन महीने बाद निजी मेडिकल परीक्षण केंद्रों से इकोकार्डियोलॉजी करवाने को कहा जाता है। उनके सहयोगी सरकारी डॉक्टरों ने बताया कि प्रत्येक अनुशंसा के बदले कुछ सौ रुपये बतौर कमीशन मिलते हैं। उनकी टिप्पणी थी : ‘इस तरह भारत के डॉक्टर अनुशंसा-कमीशन के ‘पुनीत चक्र’ के बीच जीते हैं।’

इस सारी स्थिति से निकलने को राह ढूंढऩे की जरूरत है। बेशक हाल ही में राष्ट्रीय मेडिकल आयोग के जरिए ढांचे में बदलाव किया गया है, फिर भी बहुत कुछ करने की आवश्यकता है। मेडिकल शिक्षा को सुव्यवस्थित किया जाए, इसकी शुरुआत निजी मेडिकल कॉलेजों में फीस और एमबीबीएस/पीजी सीटों में अनुपात अंतर को तर्कपूर्ण करके हो सकती है। एमबीबीएस सीटों में बढ़ोतरी के लिए ज़हन में रोजगार क्षमता का आकलन किया जाना आवश्यक है। अभिभावक और डॉक्टर बनने के चाहवान छात्रों को विदेशों में मेडिकल शिक्षा प्राप्ति के बाद की हकीकत से आगाह किया जाना चाहिए।

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