Home ब्लॉग सहकारिता क्षेत्र के लिए बूस्टर डोज है केंद्रीय बजट 2022

सहकारिता क्षेत्र के लिए बूस्टर डोज है केंद्रीय बजट 2022

सहकारी ऋण गारंटी साबित होगी गेम चेंजर
ज्योतिंद्र मेहता

सहकारिता क्षेत्र निश्चित रूप से माननीय प्रधानमंत्री का आभारी है क्?योंकि उन्?होंने पिछले कई वर्षों से नजरअंदाज किए जा रहे सहकारिता क्षेत्र का कायाकल्प करने के लिए कई अहम कदम उठाए हैं। हमें ‘सहकार से समृद्धि’ का प्रेरक नारा दिया गया है और यह सुनिश्चित करने के लिए कि इस पर अक्षरश: अमल किया जाए,  माननीय प्रधानमंत्री ने स्वतंत्र भारत में पहली बार सहकारिता क्षेत्र के लिए एक अलग मंत्रालय बनाया है और इस मंत्रालय की कमान माननीय अमितभाई को सौंपी है जो हमारे बीच एक सहयोगी के रूप में रहे हैं।
किसी भी देश की अर्थव्यवस्था तभी तेजी से आगे बढ़ती है जब अधिक से अधिक लोगों को रोजगार मिलता है और फि?र वे अर्थव्यवस्था में अहम योगदान करने में समर्थ हो जाते हैं। नौकरी चाहने वाले लोग आगे चलकर नौकरी देने वाले बन जाते हैं या स्वरोजगार में सक्षम हो जाते हैं। इसे ‘समृद्धि’ कहा जा सकता है।

भारत में 90 प्रतिशत से भी अधिक रोजगार असंगठित क्षेत्र ही देता है और सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में लगभग 50 प्रतिशत हिस्?सेदारी असंगठित क्षेत्र की ही है। सहकारिता दरअसल जमीनी स्तर पर उद्यम और उन लोगों के समूह का एक आदर्श रूप है जो व्यक्तिगत तौर पर आर्थिक दृष्टि से इतने समर्थ नहीं होते हैं कि अपने दम पर कोई व्यवसाय शुरू कर सकें। सहकारी समितियों में आर्थिक गतिविधियों के कई क्षेत्रों में प्रवेश करने की क्षमता होती है।
‘सहकार से समृद्धि’ नारे से दरअसल सहकारी समितियों की क्षमता में सरकार का पूरा भरोसा होने का स्?पष्?ट संकेत मिलता है।

इस दिशा में सरकार की गंभीरता इस वर्ष के बजट प्रस्तावों में स्?पष्?ट रूप से नजर आती है, जिसमें काफी मंथन करके सहकारिता क्षेत्र के लिए कुछ अत्?यंत उल्?लेखनीय आवंटन किए गए हैं। सरकार ने नवगठित सहकारिता मंत्रालय के लिए इस वर्ष 900 करोड़ रुपये आवंटित किए हैं, जो इससे पहले सहकारिता क्षेत्र के लिए स्वीकृत धनराशि से 3 गुना अधिक है। केंद्रीय योजनाओं के तहत पारदर्शिता, निगरानी में आसानी और उन्हें धनराशि का प्रभावकारी हस्तांतरण सुनिश्चित करने के लिए बजट में बिल्?कुल सही कदम उठाते हुए पीएसी के डिजिटलीकरण को तत्काल प्राथमिकता दी गई है।  इस वित्त वर्ष में विशेष रूप से इस उद्देश्य के लिए 350 करोड़ रुपये की राशि आवंटित की गई है। ‘वैमनीकॉम’ को एक अत्?यंत महत्वपूर्ण संस्थान के रूप में मान्यता दिए जाने और इसके साथ ही उसे अपना वार्षिक बजट तय करने की अनुमति मिल जाने से सहकारिता शिक्षा एवं प्रशिक्षण को निश्चित रूप से काफी बढ़ावा मिलेगा।

सहकारी समितियों के लिए बृहद् योजनाओं के अंतर्गत इस वर्ष के बजट में 274 करोड़ रुपये के आवंटन का प्रस्ताव दिया गया है। सरकार का यह एक दूरदर्शी निर्णय है, क्योंकि प्रत्येक क्षेत्र की सभी सहकारी समितियों का विकास होगा और वह अधिक प्रभावी होंगी, यदि उन्हें नए क्षेत्रों में विविधता लाने के लिए मार्गदर्शन प्राप्त होगा। इससे सहकारी समितियों को समर्थन प्राप्त होगा जिनकी उन्हें बहुत आवश्यकता है। इस तथ्य को भी रेखांकित किया जाना चाहिए। शहरी सहकारी बैंकिंग क्षेत्र में आरबीआई की मंजूरी प्राप्त कर ली है और राष्ट्रीय सहकारी वित्त एवं विकास निगम (एनसीएफडीसी) में पंजीकरण हो चुका है।
सरकार द्वारा इस क्षेत्र के लिए कई निर्णय लिए गए है जिनकी मांग लंबे समय से की जा रही थी। जैसे पीएसी का डिजिटलीकरण, ब्लॉक चेन तकनीक का उपयोग, कृत्रिम बुद्धिमत्ता ताकि समितियां प्रभावी ढंग से काम कर सकें और उनके पास विश्वसनीय एवं अद्यतन डेटा बैंक हो।

उम्मीद है कि इन पहलों से युवा भी सहकारी समितियों की ओर आकर्षित होंगे।
युवाओं के लिए सहकारी समितियों के संदर्भ में स्टार्टअप शुरू करने की अपार संभावना है, शर्त यह है कि नियमों को सरल बनाया जाए और कार्य करने को आसान बनाया जाए। इससे अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों एवं ऐसे क्षेत्रों जहां सहकारी समितियों की संख्या बहुत कम है, गठन में मदद मिलेगी। युवाओं के नेतृत्व में सहकारी समितियां सफल होंगी।
सहकारी क्षेत्र के लिए धन की आवश्यकता
वर्तमान में, सहकारी समितियों के पास अपनी गतिविधियों के वित्तपोषण के लिए बहुत सीमित विकल्प उपलब्ध हैं। उनकी मुद्रा बाजार तक पहुंच नहीं है।

जैसाकि पहले कहा जा चुका है, सहकारी समिति के गठन और विनियमन के लिए सरल नियम और कानून जरूरी हैं।
नए युग की सहकारी समितियों को युवाओं द्वारा संचालित किए जाने की जरूरत है और हमारे युवा आधुनिक प्रौद्योगिकी को लेकर काफी सहज हैं ताकि सहकारिता का क्षेत्र भी प्रौद्योगिकी और इंटरनेट से संचालित हो सके।
सरकार को सहकारी समितियों के आधुनिकीकरण/नए जमाने की सहकारी समितियों के निर्माण की दिशा में प्रोत्साहित करने के लिए उपयुक्त व्यवस्थाएं और योजनाएं बनानी चाहिए। ऐसा एनसीडीसी के जरिए नए जमाने की सहकारी समितियों को शुरुआती धन प्रदान करने के लिए एक अलग कोष बनाकर किया जा सकता है।
यदि सहकारी ऋण गारंटी उपलब्ध हो, तो सहकारी बैंक और अन्य ऋणदाता सहकारी समितियों को ऋण देने में और अधिक उदारता बरतेंगे।

ऋण गारंटी के जरिए सहकारी समितियों का बेहतर वित्त पोषण
यह बिल्कुल स्पष्ट है कि यदि ऋण प्रदान करने वाली संस्था को ऋण जोखिम के संबंध में गारंटी दी जाए, तो वह अधिक जोखिम लेगी और भौतिक रूप से जमानत के लिए कुछ उपलब्ध नहीं होने की स्थिति में उस पर जोर नहीं देना स्वीकार कर लेगी।
नेशनल क्रेडिट गारंटी ट्रस्टी कंपनी
ऋणदाताओं को कई कार्यक्षेत्रों में क्रेडिट गारंटी कवर प्रदान की जाती है। भारत में, वित्त मंत्रालय ने नेशनल क्रेडिट गारंटी ट्रस्टी कंपनी नाम की एक संस्था बनाई है जो विभिन्न प्रकार के व्यवसायों को क्रेडिट गारंटी प्रदान करने वाली पांच निधियों (फंडों) के ट्रस्टों को नियंत्रित करती है।

इस बात पर ध्यान दिया जा सकता है कि आईबीए के तहत अधिसूचित चंद सहकारी बैंक सदस्यों को छोडक़र किसी भी योजना में पात्र उधार देने वाले संस्थानों (ईएलआई) के रूप में सहकारी बैंक शामिल नहीं हैं।
एक फिर से इस सरकार को इस बात का श्रेय जाता है कि उन्होंने इस वर्ष सूक्ष्म एवं लघु उद्यमों के लिए एक योजना, सीजीटीएमएसई, में गैर-अधिसूचित सहकारी बैंकों को पात्र उधार देने वाले संस्थान (ईएलआई) के रूप में शामिल करने की घोषणा की है।
नेशनल क्रेडिट गारंटी ट्रस्टी कॉरपोरेशन (वित्त मंत्रालय के वित्तीय सेवा विभाग के तहत), जोकि वर्तमान में 13,000 करोड़ रुपये की समर्पित ऋण गारंटी निधि से लैस पांच ट्रस्टों की देख-रेख कर रहा है, सभी ईएलआई द्वारा सहकारी क्षेत्र के वित्त पोषण के लिए दो और कोषों (फंड) को जोड़ सकता है– एक, कृषि सहकारी समितियों को दिए जाने वाले ऋण के लिए और दूसरा गैर-कृषि सहकारी समितियों को दिए जाने वाले ऋण के लिए।

यदि एनसीजीटीसी सहकारी समितियों के क्रेडिट गारंटी पोर्टफोलियो को शामिल करने की स्थिति में नहीं है, तो वित्तीय सेवा विभाग के अधीन एनसीजीटीसी की स्थापना की तर्ज पर सहकारिता मंत्रालय कुछ राशि निर्धारित करके अपने मातहत एक कंपनी स्थापित करने पर विचार कर सकता है। इस कंपनी को नेशनल कोऑपरेटिव क्रेडिट गारंटी ट्रस्टी कंपनी (एनसीसीजीटीसी) का नाम दिया जा सकता है या इसे किसी अन्य उपयुक्त नाम से संबोधित किया सकता है।
इस कंपनी द्वारा प्रबंधित किए जाने वाली विभिन्न ट्रस्टों के तहत ऋण देने वाली पात्र संस्थाओं में वैसे सभी सहकारी बैंक और बहुराज्यीय सहकारी ऋण समितियां शामिल होंगी, जो अपने वित्तीय स्वास्थ्य के संदर्भ में कुछ न्यूनतम मानदंडों को पूरा करती हैं।
सिर्फ सहकारिता मंत्रालय के अंतर्गत प्रस्तावित नेशनल कोऑपरेटिव क्रेडिट गारंटी ट्रस्ट कंपनी द्वारा अंतिम रूप से तैयार योजनाओं के तहत सहकारी समितियों को दिए जाने वाले ऋण और एनसीसीजीटीसी की योजनाओं द्वारा तथा सहकारी बैंकों एवं अन्य बैंकों द्वारा गारंटी के लिए शामिल नहीं किए गए ऋण भी पात्र होंगे।
यह तर्क दिया जा सकता है कि सहकारी ऋण क्षेत्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा 1541 मजबूत शहरी सहकारी बैंकिंग क्षेत्र है, जिसमें पांच लाख करोड़ रुपये से अधिक का कुल जमा आधार है और तीन लाख करोड़ रुपये के ऋण हैं।
इनमें से कुछ बैंक तो कई वाणिज्यिक बैंकों और लघु वित्त बैंकों (एसएफबी) से भी बड़े हैं और तकनीकी रूप से भी वाणिज्यिक बैंकों की तरह ही सुसज्जित हैं।

1965 में सहकारी बैंकों को भारतीय रिज़र्व बैंक (आरबीआई) के नियामक नियंत्रण में लाने के समय बैंकिंग विनियमन अधिनियम में संशोधन किया गया था और शहरी सहकारी बैंकों को संभवत: इस अनुमान के आधार पर प्राथमिक सहकारी बैंकों (पीएसी) के रूप में परिभाषित किया गया था कि वे प्राथमिक कृषि संगठनों (प्राइमरी एग्रीकल्चर सोसाइटी) के शहरी प्रतिरूप हैं। हालांकि यह धारणा तब भी तार्किक नहीं लगती थी, वर्तमान संदर्भ में यह धारणा बेहद ही औचित्यहीन है।
अपनी परिभाषा के कारण, शहरी सहकारी बैंकों (यूसीबी), जिन्हें शहरी क्षेत्रों में गैर-कृषि सहकारी समितियों का स्वाभाविक ऋणदाता होना चाहिए, को सहकारी समितियों को ऋण देने से प्रतिबंधित किया जाता है।
इस विसंगति को ठीक किया जाना और उन्हें बैंकिंग विनियमन अधिनियम 1949 के भाग (एएसीएस) में उपयुक्त संशोधन के जरिए प्राथमिक सहकारी बैंकों के बजाय शहरी सहकारी बैंकों के रूप में परिभाषित किया जाना जरूरी है ताकि वे सहकारी समितियों को ऋण देने की स्थिति में आ सकें।
लेखक अध्यक्ष, नेफकॉब हैं

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