वीरान गांवों के मौन पहरेदार बने ‘खोली’ के गणेश: पलायन के बीच देहरी पर आज भी डटे हैं आस्था के रक्षक
पहाड़ के वीरान घरों के सन्नाटे में आज भी कोई मौन पहरा दे रहा है। समय की मार से दीवारें दरक चुकी हैं, छतें झुक गई हैं और आंगन सूने पड़ गए हैं, लेकिन घर की देहरी पर बैठे गणेश आज भी अपनी जगह पर अडिग हैं। गांव खाली हो गए, दरवाजों पर लटके ताले जंग खा गए और वह पुरानी लकड़ी जिस पर कभी नक्काशी चमकती थी, आज वक्त की मार और दीमक की वजह से जर्जर हो चुकी है। इसके बावजूद ‘खोली’ के गणेश अपनी जगह से टस से मस नहीं हुए।
उत्तराखंड के पहाड़ों में यह केवल एक मूर्ति नहीं, बल्कि पीढ़ियों की आस्था, घर की मर्यादा और समृद्ध संस्कृति का जीवित प्रतीक है। कभी हर पहाड़ी घर की चौखट पर मुस्कुराने वाले ये गणेश आज भारी पलायन, बदलते समय और टूटते गांवों के बीच एक मूक इतिहास की तरह खड़े हैं। जब सर्द हवाएं इन खाली गांवों की गलियों से गुजरती हैं, तो ऐसा आभास होता है जैसे ये गणेश अब भी अपनों के लौटने की राह ताक रहे हों।
उत्तराखंड की इस अनूठी परंपरा में घर का मुख्य द्वार केवल आने-जाने का रास्ता नहीं, बल्कि गहरी आस्था का केंद्र हुआ करता था। स्थानीय भाषा में मुख्य द्वार को ‘खोली’ कहा जाता है और वहां विराजमान गणेश को परिवार के बुजुर्ग सदस्य और सजग पहरेदार की तरह सम्मान दिया जाता था।
पुराने समय में घर निर्माण के दौरान स्थानीय शिल्पकार टुन या देवदार की लकड़ी पर चौखट के ठीक बीच ‘सिरदल’ पर भगवान गणेश की सुंदर आकृति उकेरते थे। लोक मान्यता थी कि जिस घर की खोली में गणेश का वास होगा, वहां दुख, दरिद्रता और बुरी शक्तियां प्रवेश नहीं करेंगी।
आज कई गांवों में बड़े-बड़े ताले लटके हैं, आंगन झाड़ियों से भर गए हैं और दीवारें गिर रही हैं, लेकिन खंडहरों की चौखटों पर आज भी ‘खोली के गणेश’ अपना धर्म निभा रहे हैं। यह व्यथा केवल एक परंपरा के लुप्त होने की नहीं, बल्कि उस पहाड़ की है जहां घर तो खाली हो गए, पर आस्था आज भी दरवाजे पर पहरा दे रही है।
