पानी के डर को हराया, ओलंपिक पोडियम पर रचा इतिहास; धिनिधि की शानदार उड़ान
किसी खेल से नफरत करने वाली लड़की का उसी खेल में देश के लिए इतिहास रच देना आसान नहीं होता। धिनिधि देसिंघु की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। एक वक्त था जब उन्हें पानी में उतरना पसंद नहीं था। यहां तक कि पानी के अंदर सिर डालने और स्विमिंग पूल में पैर रखने से भी वह डरती थीं। लेकिन आज वही धिनिधि अपनी रफ्तार और हौसले से दुनिया के सामने भारत की नई पहचान बन रही हैं।
सोमवार को डकार में हुए यूथ ओलंपिक में धिनिधि ने महिलाओं की 100 मीटर फ्रीस्टाइल रेस में 56.27 सेकंड का समय निकालकर कांस्य पदक हासिल किया। इस उपलब्धि के साथ वह सीनियर और यूथ, दोनों स्तरों पर ओलंपिक इवेंट में मेडल जीतने वाली पहली भारतीय तैराक बन गईं।
आखिरी 50 मीटर में बदली बाजी, बनाया नेशनल रिकॉर्ड
धिनिधि की यह जीत सिर्फ एक मेडल तक सीमित नहीं रही, बल्कि उन्होंने अपने प्रदर्शन से नया राष्ट्रीय रिकॉर्ड भी बना दिया। उन्होंने 56.27 सेकंड में रेस पूरी की। इससे पहले 18 जून को अहमदाबाद में आयोजित इंडियन चैंपियनशिप में उन्होंने 56.57 सेकंड का समय निकाला था। अब उन्होंने अपने ही प्रदर्शन को बेहतर कर दिया।
इस मुकाबले में क्रोएशिया की एना बोबानोविच ने 55.89 सेकंड के साथ गोल्ड मेडल जीता, जबकि न्यूजीलैंड की एलिसा लॉसन 56.13 सेकंड के समय के साथ दूसरे स्थान पर रहीं।
धिनिधि की रेस का सबसे दिलचस्प हिस्सा आखिरी 50 मीटर रहा। शुरुआती 50 मीटर की दूरी उन्होंने 27.31 सेकंड में पूरी की और उस समय वह पांचवें स्थान पर थीं। हालांकि, उन्होंने हार नहीं मानी। रेस के दूसरे हिस्से में अपनी रफ्तार बढ़ाई और शानदार वापसी करते हुए तीसरे स्थान पर पहुंच गईं। इसी के साथ उन्होंने पोडियम पर अपनी जगह पक्की कर ली।
मां के धक्के से शुरू हुआ स्विमिंग का सफर
धिनिधि की सफलता के पीछे एक ऐसा किस्सा है, जो उनकी उपलब्धि को और खास बना देता है। जिस खेल में आज वह मेडल जीत रही हैं, कभी उसी से उन्हें नफरत थी।
फाइनल से पहले Olympics.com को दिए इंटरव्यू में धिनिधि ने अपने शुरुआती दिनों को याद किया। उन्होंने बताया कि उनकी मां कभी-कभी उन्हें धक्का देकर पानी में डाल देती थीं। शुरुआत में उन्हें यह बिल्कुल पसंद नहीं था। पानी में रहना और उसके अंदर सिर डालना उनके लिए बेहद मुश्किल था। उन्हें ऊंचाई से भी डर लगता था।
धिनिधि ने बताया, ‘मेरी मां मुझे धक्का देकर पानी में डाल देती थीं। धीरे-धीरे मुझे यह खेल पसंद आने लगा। फिर मुझे इससे प्यार हो गया।’
उन्होंने यह भी बताया कि समय के साथ जब वह प्रतियोगिताएं जीतने लगीं और उनके दोस्त बनने लगे, तो स्विमिंग के प्रति उनका नजरिया बदलता चला गया। यही बदलाव उन्हें आज इस मुकाम तक लेकर आया है।
14 साल की उम्र में खेला था पेरिस ओलंपिक
धिनिधि का अंतरराष्ट्रीय सफर भी कम उम्र में शुरू हो गया था। पेरिस 2024 ओलंपिक में जब उन्होंने भारत का प्रतिनिधित्व किया, तब उनकी उम्र महज 14 साल थी। वह भारतीय दल की सबसे कम उम्र की सदस्य थीं।
उन्होंने पेरिस ओलंपिक में महिलाओं की 200 मीटर फ्रीस्टाइल स्पर्धा में हिस्सा लिया था और कुल मिलाकर 23वां स्थान हासिल किया था। हालांकि, उस समय उनके लिए यह पदक जीतने से ज्यादा एक बड़ा अनुभव हासिल करने का मौका था।
आज यूथ ओलंपिक में कांस्य पदक और नेशनल रिकॉर्ड के साथ उनका सफर एक नई ऊंचाई पर पहुंच चुका है।
घबराहट को कमजोरी नहीं, ताकत मानती हैं धिनिधि
धिनिधि के खेल के साथ-साथ उनका आत्मविश्वास भी उन्हें अलग बनाता है। फाइनल से पहले उन्होंने बताया था कि वह मुकाबले के दबाव को अपने ऊपर हावी नहीं होने देना चाहतीं। उनका मानना था कि गर्म मौसम में भी वह अच्छा प्रदर्शन कर सकती हैं और अपनी पसंदीदा रेस में उतरना उनके लिए राहत की बात है।
वह घबराहट को भी नकारात्मक नहीं मानतीं। उनके मुताबिक, थोड़ी घबराहट खिलाड़ी के लिए मददगार हो सकती है, क्योंकि इससे शरीर में अतिरिक्त ऊर्जा आती है। वह इसी ऊर्जा को अपने प्रदर्शन में शामिल करने की कोशिश करती हैं।
धिनिधि देसिंघु की कहानी बताती है कि किसी चीज से शुरुआत में डर लगना या उसे पसंद न करना आपकी मंजिल तय नहीं करता। कभी पानी में उतरने से घबराने वाली इस बेटी ने उसी पानी में अपनी मेहनत के दम पर इतिहास रच दिया है। 16 साल की उम्र में मिली यह उपलब्धि भारतीय तैराकी के लिए भी एक बड़ी उम्मीद है।

