झोपड़ी से अमेरिका तक का सफर, संघर्षों को पछाड़ वैज्ञानिक बने जयकुमार
Success Story: कभी मां के साथ एक वक्त का खाना खाकर गुजारा करने वाले जयकुमार वैद्य ने अपनी मेहनत और प्रतिभा के दम पर ऐसी कामयाबी हासिल की, जिसकी मिसाल दी जा सकती है। मुंबई की एक छोटी सी चॉल से निकलकर वह अमेरिका की प्रतिष्ठित वर्जीनिया यूनिवर्सिटी तक पहुंचे। कभी फीस नहीं होने के कारण परीक्षा से रोके गए जयकुमार आज वहां पांच साल के शोध कार्यक्रम में ग्रेजुएट रिसर्च असिस्टेंट के तौर पर काम कर रहे हैं।
मुंबई के कुर्ला वेस्ट की गौरी शंकर चॉल के एक छोटे से कमरे में जयकुमार वैद्य का बचपन बेहद मुश्किलों में बीता। 15 सितंबर 1994 को जन्मे जयकुमार ने बचपन से ही अपनी मां नलिनी को परिवार की जिम्मेदारियों के लिए संघर्ष करते देखा। पति से तलाक के बाद मां ने अकेले ही बेटे की परवरिश का जिम्मा उठाया। वह एक पैकेजिंग फर्म में महज 8,000 रुपये महीने की नौकरी करती थीं। लेकिन 2003 में उनकी नौकरी छूट गई और परिवार के सामने घर का खर्च चलाने के साथ जयकुमार की पढ़ाई जारी रखने का संकट खड़ा हो गया।
फीस नहीं थी, तो परीक्षा से भी होना पड़ा वंचित
आर्थिक तंगी का असर जयकुमार की पढ़ाई पर भी पड़ा। कई बार स्कूल की फीस जमा नहीं होने के कारण उन्हें परीक्षा में बैठने तक नहीं दिया गया। हालात इतने खराब थे कि मां-बेटे को कई बार एक ही वक्त वड़ा पाव या समोसा खाकर गुजारा करना पड़ता था।
जब जयकुमार महज 11 साल के थे और छठी कक्षा में पढ़ते थे, तभी उन्होंने परिवार की मदद के लिए काम करना शुरू कर दिया। कभी टेलीविजन मरम्मत की दुकान पर तो कभी कपड़े की दुकान पर छोटी-मोटी नौकरी करके वह मां का हाथ बंटाने लगे। हालांकि, दोनों की कमाई से मुंबई जैसे महंगे शहर में घर चलाना आसान नहीं था।
रिश्तेदारों और आसपास के लोगों से मदद नहीं मिली तो एक स्थानीय मंदिर ट्रस्ट ने उनका सहारा बना। ट्रस्ट की ओर से मां-बेटे को पुराने कपड़े, राशन और रोजमर्रा की जरूरत का सामान दिया गया। साथ ही जयकुमार की स्कूल फीस भरने में भी मदद की गई।
बिना ब्याज के कर्ज से मिला इंजीनियरिंग कॉलेज में दाखिला
स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद जयकुमार के सामने कॉलेज की फीस जुटाने की चुनौती थी। बैंकों से कर्ज लेने की कोशिश की, लेकिन परिवार की स्थायी आमदनी नहीं होने के कारण सफलता नहीं मिली। ऐसे मुश्किल वक्त में इंडियन डेवलपमेंट फाउंडेशन ने उनकी मदद की और बिना ब्याज का कर्ज उपलब्ध कराया। इसकी बदौलत जयकुमार को केजे सोमैया कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग में दाखिला मिल सका।
इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई के दौरान जयकुमार की दिलचस्पी रोबोटिक्स और नैनोफिजिक्स में बढ़ने लगी। रोबोटिक्स के क्षेत्र में उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर तीन और राज्य स्तर पर चार पुरस्कार हासिल किए। उनकी प्रतिभा को देखते हुए उन्हें लार्सन एंड टूब्रो में इंटर्नशिप का अवसर मिला।
इसके बाद उन्हें टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च (टीआईएफआर) में 30 हजार रुपये प्रतिमाह की नौकरी मिल गई। यह उनके जीवन का अहम मोड़ साबित हुआ।
नौकरी के साथ जारी रखी पढ़ाई और शोध की तैयारी
टीआईएफआर में काम करते हुए जयकुमार ने अपनी आर्थिक स्थिति सुधारने के साथ परिवार की जिम्मेदारियां भी निभाईं। उन्होंने अपनी कमाई से घर की मरम्मत कराई और जरूरत के समय लोगों से लिया गया छोटा-मोटा कर्ज चुकाया।
आगे की पढ़ाई और विदेश में शोध के सपने को पूरा करने के लिए उन्होंने जीआरई और टोफेल परीक्षाओं की तैयारी शुरू की। बढ़ते खर्चों को पूरा करने के लिए वह डिजिटल इलेक्ट्रॉनिक्स, सर्किट एंड ट्रांसमिशन लाइंस, सिग्नल्स एंड सिस्टम्स और कंट्रोल सिस्टम्स की कोचिंग भी देने लगे।
टीआईएफआर में जूनियर रिसर्च एसोसिएट के तौर पर काम करते हुए जयकुमार ने 2017 और 2018 में दो शोध पत्र तैयार किए, जो अंतरराष्ट्रीय जर्नल्स में प्रकाशित हुए। उनके शोध कार्य और प्रतिभा पर अमेरिका की वर्जीनिया यूनिवर्सिटी की नजर पड़ी। इसके बाद यूनिवर्सिटी ने उन्हें ग्रेजुएट रिसर्च असिस्टेंट के रूप में पांच साल के शोध कार्यक्रम के लिए आमंत्रित किया।
गुरु ने भी बताया असाधारण प्रतिभा का धनी
टीआईएफआर में जयकुमार के मार्गदर्शक प्रोफेसर एम. देशमुख ने उनकी उपलब्धियों का श्रेय उनकी मेहनत और लगन को दिया। उन्होंने जयकुमार को असाधारण रूप से परिश्रमी बताते हुए कहा कि उन्होंने अपने जीवन में उनके जैसा छात्र नहीं देखा। संस्थान में तीन साल तक की गई उनकी मेहनत ही पीएचडी प्रोग्राम तक पहुंचने का रास्ता बनी।
मां को अमेरिका ले जाने का है सपना
जयकुमार का सपना सिर्फ अपनी सफलता तक सीमित नहीं है। वह नैनो और माइक्रोटेक्नोलॉजी के क्षेत्र में भारत को महाशक्ति बनते देखना चाहते हैं। इसके साथ ही उनका एक बेहद भावुक सपना अपनी मां को अमेरिका ले जाने का भी है।
जयकुमार का कहना है कि वह दो साल के भीतर अपनी मां को अमेरिका लाना चाहते हैं, क्योंकि उनके मुताबिक उनकी मां दुनिया की तमाम खुशियों की हकदार हैं।
जिस मां ने कभी आर्थिक तंगी के बीच बेटे की पढ़ाई जारी रखने के लिए हर संभव संघर्ष किया, आज उसी बेटे की सफलता उसे बेहतर जिंदगी देने का सपना देख रही है। जयकुमार वैद्य की कहानी बताती है कि मुश्किल हालात रास्ता जरूर रोक सकते हैं, लेकिन मजबूत इरादों और लगातार मेहनत के आगे मंजिल दूर नहीं रहती।

