Saturday, October 23, 2021
Home उत्तराखंड चुनाव से ऐन पहले बदल जाती है इनकी निष्‍ठा

चुनाव से ऐन पहले बदल जाती है इनकी निष्‍ठा

देहरादून। चुनाव से ऐन पहले राजनीती  के कई खिलाड़ी ऐसे है जिनकी निष्‍ठा समय के साथ बदल जाती है, जिस दल को गाली देकर चुनावी रण में अपनी भड़ास निकाल कर दे खिलाड़ी विधानसभा या लोकसभा जैसे सवैधानिक भवन में  प्रवेश करने लायक बनाते हैं उसी दल के प्रति इनकी  निष्‍ठा अगला चुनाव आते ही एकदम से बदल जाती है। अब वहीं दल जिसमें रहते हुए ये विधायक या सांसद बने हैं इनको अपना दुश्‍मनों का दल नजर आने लगता है। जी हां उत्‍तराखण्‍ड में आजकल ऐसे खिलाड़ी कई देखे जाने लगे हैं।
उत्तराखंड में जैसे-जैसे विधानसभा चुनाव  नजदीक आ रहे हैं, दलबदल का सिलसिला तेज हो गया है। शुरुआत भाजपा ने की थी, जो अब तक कांग्रेस के एक व दो निर्दलीय विधायकों को पार्टी में शामिल करा चुकी है। अब कांग्रेस ने भाजपा को झटका देते हुए कैबिनेट मंत्री यशपाल आर्य व उनके विधायक पुत्र संजीव आर्य की घर वापसी करा दी। घर वापसी इस लिहाज से कि आर्य पहले कांग्रेस में ही थे और वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव से पहले ही वह भाजपा में शामिल हुए थे।
चुनाव से पहले दल बदलना या कहें कि निष्ठा बदलना सामान्य बात है और उत्तराखंड में भी यह होता रहा है। इतना फर्क जरूर है कि पहले ऐसा छिटपुट होता था, मगर वर्ष 2016 के बाद इसने अपेक्षाकृत व्यापक रूप ले लिया। तब कांग्रेस के एक पूर्व मुख्यमंत्री समेत नौ विधायकों ने एक साथ भाजपा का दामन थाम लिया था। यह सिलसिला वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव तक चला और इस दौरान एक कैबिनेट मंत्री समेत दो विधायक कांग्रेस छोड़ भाजपा में चले गए थे। महत्वपूर्ण बात यह कि इससे पहले दो अवसर ऐसे आए, जब तत्कालीन मुख्यमंत्री ने विधानसभा चुनाव लड़ने के लिए विपक्षी विधायक से सीट खाली कराई।
पहले वर्ष 2007 में भुवन चंद्र खंडूड़ी के लिए कांग्रेस के टीपीएस रावत और फिर वर्ष 2012 में विजय बहुगुणा के लिए भाजपा के किरण मंडल ने सीट छोड़ी थी। साफ है कि छोटा राज्य होने के बावजूद दलबदल जैसी परिपाटी से उत्तराखंड भी खुद को अलग नहीं रख पाया। इतना जरूर है कि दल बदलने वाले विधायकों को या तो अपनी सदस्यता से हाथ धोना पड़ा या फिर उन्होंने खुद ही इस्तीफा दे दिया। राजनीति में दल बदलने का फैसला नेता अपने भविष्य की सुरक्षा के मद्देनजर ही करते हैं, मगर इससे मतदाता का विश्वास कहीं न कहीं टूटता है। चुनाव में जीत दिलाकर जिस नेता को विधायक बनाया, वह कितना कसौटी पर खरा उतरा, यह तो मतदाता ही तय करेंगे। अगर वह अपने क्षेत्र के विकास और जन हितों के लिए संघर्षरत और समर्पित रहे तो शायद उसे निष्ठा बदलने की जरूरत ही न पड़े। चुनाव के वक्त राजनीतिक दल स्वयं इस तरह की कोशिश करते हैं, इससे दलबदल को बढ़ावा मिलता है।
जब तक राजनीतिक दल खुद आगे आकर दलबदल पर रोक की पहल नहीं करेंगे, यह सब चलता ही रहेगा। ऐसा होना फिलहाल तो मुमकिन नहीं दिखता, लिहाजा इस स्थिति में मतदाता की ही भूमिका सबसे अहम हो जाती है। जरूरी है कि मतदाता आकलन करे और अपने विवेक से फैसला ले। चुनाव से पहले दल बदलना सामान्य बात है। उत्तराखंड को अलग राज्य बने अभी 21 साल ही होने जा रहे हैं, लेकिन इस परिपाटी से यह राज्य भी अछूता नहीं
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