ख़ाकी सेना की ‘बलि विदाई’
– कहानीकार आशीष की ज़ुबानी, विनोद की चौपाल में
चौपाल वही पुरानी थी, लेकिन आज का माहौल ज़रा अलग था। कुनकुनी धूप में गरमा-गरम चाय के साथ स्नैक्स सजे थे—समोसे, मठरी, और मूँगफली की प्लेटें आगे रखी थीं। सामने विनोद चाय की चुस्कियों में मगन बैठा था, और बाकी लोग भी कान लगाए थे, क्योंकि आज आशीष एक ज़बरदस्त किस्सा सुनाने वाला था।
आशीष ने आँखें मटकाईं, गला खंखारा और शुरू हुआ—
“भैया विनोद, इस पहाड़ी देश की ख़ाकी सेना का हाल सुना है? अबे, ऐसा विदाई समारोह तो इतिहास में दर्ज होने लायक था! हुआ यूँ कि सेना के तीन बड़े धुरंधर सैन्य कमांडरों को कुछ वर्षों के लिए बाहर भेजने का हुक्म हुआ। इस ‘ऐतिहासिक’ पल को यादगार बनाने के लिए प्रमुख छावनी में भव्य समारोह रखा गया, बड़े-बड़े सैन्य कमांडर टनाटन बनकर आए, शानदार मोमेंटो मंगवाए गए, और कसीदे पढ़े गए जैसे तीनों कोई युद्ध जीतकर लौटे हों!
वैसे भी, बलि देते समय भी तो टीका-वीका लगाकर, माला पहनाकर, पूरी शान से ले जाया जाता है!”
अब असली मज़ा तब आया जब तीनों को बोलने के लिए बुलाया गया। फिर जो हुआ, वो सालों तक याद रखा जाएगा!”
पहले कमांडर की गाथा
पहले कमांडर साहब का दर्द ऐसा छलका कि गंगा-जमुना भी शर्मिंदा हो जाएँ। मंच पर आए, माइक सँभाला और बोले—
“भैया, मैं तो वर्षों से बाहर जाने को तैयार बैठा था, लेकिन तब भेजा नहीं गया। फिर एक दिन सोचा कि चलो, छुट्टी मना लें। घर पहुँचा ही था कि अचानक फ़ोन आया—‘आपका नाम बाहर जाने वालों में भेज दिया गया है!’
मतलब, भाईसाहब, ये वही बात हो गई कि जब आदमी बेफिक्री से समोसा खा रहा हो और अचानक ख़बर आए—”चल भाई, तेरा तबादला हुआ है, अगले आदेश तक गुलाटी मारने की सेवा में रहना!”
अब हॉल में बैठे अफ़सरों की शक्लें देखने लायक थीं—कुछ बगले झाँकने लगे, कुछ ऐसे हँसे कि जैसे सरकारी वेतन समय पर आ गया हो।
दूसरे कमांडर का तंज
दूसरा कमांडर आया तो उसकी बॉडी लैंग्वेज देखकर लग रहा था कि सरकार ने जैसे नोटबंदी कर दी हो। बोले—
“देखो भैया, हम सैन्य कमांडर हैं, आदेश मानना हमारा धर्म है। इसलिए जा तो रहे हैं, लेकिन जाते-जाते विरोध दर्ज करा रहे हैं।”
मतलब, सरकारी बाबू की तरह जाते-जाते ‘नो ड्यूज’ भी दे दिया और ऊपर से रसीद भी कटवा ली।
तीसरे कमांडर ने तो स्पीच के नाम पर ‘धमाका’ कर दिया
अब असली बम फूटा तीसरे कमांडर की स्पीच से। भाईसाहब, उन्होंने तो पूरे सिस्टम की ऐसी-तैसी कर दी!
“उन्होंने अपनी मैराथन स्पीच में हँसते-हँसते कई अफ़सरों को ऐसा रुहासा कर दिया कि मानो काटो तो खून ही नहीं! पूरे तंत्र की पोल ऐसे खोली कि कुछ अफ़सर चटखारे लेकर सुनते रहे, तो एक-आध की बुदबुदाहट सुनाई दी—’भाईसाहब, आप स्पीच पूरी कर लो, हमने अपने निकलने का कार्यक्रम बढ़ा दिया है!’
अब तो चौपाल के सारे लोग पेट पकड़कर हँसने लगे। विनोद तो कुर्सी से गिरते-गिरते बचा!
“पर असली मज़ा तब आया जब हाल ही में कुछ रियासतों के मालिक बने एक बड़े सैन्य कमांडर पेट पकड़-पकड़ कर हँसते दिखे। वो ऐसे हँस रहे थे जैसे किसी ने उनके हिस्से की ज़मीन दो गुनी कर दी हो!”
अब चौपाल में ठहाकों की सुनामी थी।
आशीष ने आख़िरी चुस्की ली और विनोद से पूछा—”तो भैया, बताओ, यह विदाई थी या बलि?”
विनोद ने हँसी रोकते हुए जवाब दिया—”बलि भी, तेरहवीं भी, और लड़की की विदाई भी! वैसे, अगली बारी किसकी है?”
चौपाल फिर से ठहाकों से गूंज उठी, और आशीष की कहानी ख़त्म होने के बाद भी उसकी गूँज लोगों के कानों में बजती रही।
