Thursday, December 1, 2022
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गुणवान अनाज

यूं तो केंद्र सरकार के आगामी वित्तीय वर्ष के बजट में किसानों के लिये कई बड़ी घोषणाएं की गयी हैं जिनमें एमएसपी के लिये एकमुश्त रकम तय करने, 1208 मीट्रिक टन गेहूं-धान खरीदने, प्राकृतिक खेती विकसित करने के लिये राज्यों व एमएसएमई की भागीदारी बढ़ाने, ड्रोन का उपयोग बढ़ाने, केन-बेतवा लिंक योजना से सिंचाई का दायरा बढ़ाने, रेलवे की मदद से लॉजिस्टिक विकसित करने जैसी घोषणाएं शामिल हैं। लेकिन एक घोषणा ने देश का ध्यान खींचा, वह है इस साल को मोटा अनाज वर्ष के रूप में मनाया जाना। दरअसल, सदियों से भारत में मोटे अनाज का उत्पादन होता रहा है। इसकी वजह यह कि इसकी उत्पादन लागत कम होती है। अधिक तापमान में खेती संभव है। इसमें सिंचाई के लिये पानी की कम खपत होती है। साथ ही कम उपजाऊ भूमि में इसका उत्पादन हो सकता है। इसके अलावा कीटनाशकों की कम जरूरत होती है और किसान रासायनिक खादों से परहेज करते हुए कंपोस्ट खाद से भी इसका उत्पादन कर सकते हैं।

दरअसल, केंद्र सरकार ने वर्ष 2018 में इस दिशा में पहल की थी जिसके उपरांत मोटे अनाज का उत्पादन जो वर्ष 2017-18 में 164 लाख टन था, वह वर्ष 2020-21 जून-जुलाई में बढक़र 176 लाख टन हो गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का इस मुद्दे पर विशेष ध्यान रहा और उन्होंने वैश्विक स्तर पर भी प्रयास किये। यह भारत के प्रयासों की बड़ी कामयाबी है कि संयुक्त राष्ट्र महासभा ने भारत के प्रस्ताव को सर्वसम्मति से स्वीकार करते हुए वर्ष 2023 को मोटे अनाज का अंतर्राष्ट्रीय वर्ष घोषित किया है। दरअसल,मोटे अनाज में बाजरा, ज्वार, जौ, कोदो आदि फसलें आती हैं। इस प्रस्ताव को दुनिया के 70 देशों का समर्थन मिला है। निस्संदेह यह इन फसलों के पारिस्थितिकीय लाभ को प्रोत्साहित करने की ओर सार्थक कदम है। इस पहल से न केवल खाद्य सुरक्षा व किसानों के कल्याण को प्रोत्साहन मिलेगा बल्कि यह कृषि वैज्ञानिकों और स्टार्ट-अप समूहों के लिये शोध व नवोन्मेष के रास्ते खोलता है।

निस्संदेह, वर्ष 2023 को अंतर्राष्ट्रीय मोटा अनाज वर्ष घोषित करने से अंतर्राष्ट्रीय बाजार में भारतीय किसानों के लिये नये अवसर विकसित होते हैं। देश के संदर्भ में यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि इनकी पौष्टिकता की संभावनाओं से लोगों के स्वास्थ्य की भी रक्षा होती है। जाहिरा तौर पर परंपरागत फसलों से अधिक कीमत होने के कारण बाजार में ज्वार-बाजरा जैसे मोटे अनाज की मांग बढ़ेगी। इन फसलों के उत्पादन में पानी, रासायनिक खाद व कीटनाशकों की खपत कम होने से किसान की लागत घटेगी। कम उपजाऊ मिट्टी में इन फसलों की खेती की जा सकती है। इतना ही नहीं, ग्लोबल वार्मिंग संकट के चलते मौजूदा फसलों पर जो खतरा मंडरा रहा है, उसे भी कम किया जा सकेगा। बशर्ते अनाज विपणन, भंडारण और आपूर्ति शृंखला की विसंगितियों को दूर किया जाए। देश के कृषि व खाद्य प्रसंस्करण उद्योग को भी इस दिशा में पहल करनी चाहिए। दरअसल, हरित क्रांति के बाद खेती-किसानी के तौर-तरीके बदले और कृषि गेहूं-धान पर केंद्रित हो गई। इसका एक कारण इन फसलों को मिलने वाले न्यूनतम समर्थन का भरोसा भी रहा। देश में संपन्नता आने से लोगों की खानपान की आदतों में भी बदलाव आया जिससे परंपरागत फसलें हाशिये पर चली गईं।

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