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हताशा का आत्मघात

देश की संसद में सरकार द्वारा पेश किया गया यह आंकड़ा विचलित करता है कि पिछले तीन सालों में बेरोजगारी व कर्ज के चलते 26 हजार लोगों ने मौत को गले लगा लिया। निस्संदेह, यह महज सरकारी आंकड़ा है लेकिन इस समस्या के मूल में जाने की जरूरत है। यूं तो बेरोजगारी हमारी अर्थव्यवस्था का सनातन संकट है लेकिन कोरोना महामारी ने इस संकट में ईंधन का काम किया है। विपक्ष लगातार बेरोजगारी के संकट के लिए सरकार की घेराबंदी करता रहा है। आरोप है कि देश में बेरोजगारी का आंकड़ा पिछले पांच दशक में सर्वाधिक है।

पिछले दिनों बजट सत्र में चर्चा के दौरान राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो यानी एनसीआरबी के आंकड़ों का हवाला देते हुए गृह राज्य मंत्री ने राज्यसभा में एक प्रश्न के लिखित जवाब में जानकारी दी थी कि बेरोजगारी व कर्ज के चलते तीन साल में 26 हजार लोगों ने आत्महत्या कर ली। यहां तक कि महामारी के पहले वर्ष 2020 में बेरोजगारों की आत्महत्या का आंकड़ा तीन हजार पार चला गया। इस दौरान बेरोजगारी के चलते 3,548 लोगों ने आत्महत्या की। जबकि वर्ष 2019 में 2,851 और 2018 में 2,741 लोगों ने बेरोजगारी के कारण आत्महत्या कर ली। वहीं दूसरी ओर, सरकार ने बताया कि वर्ष 2018 से 2020 के बीच 16,000 से अधिक लोगों ने दिवालियेपन या कर्ज में डूबने के कारण आत्महत्या की। गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय के अनुसार, वर्ष 2020 में 5,213 लोगों, 2019 में 5,908 और 2018 में 4,970 लोगों ने आत्महत्या कर ली। निस्संदेह, बेरोजगारी और आर्थिक संकट के चलते आत्महत्या करने के आंकड़े का बढऩा समाज विज्ञानियों के लिये चिंता का विषय होना चाहिए। यही वजह है कि विपक्ष लगातार इस मुद्दे पर सरकार पर हमले करता रहा है। वहीं दूसरी ओर, राजग सरकार के कार्यकाल 2014-2020 के बीच बेरोजगारों के खुदकुशी के 18,772 मामले दर्ज किये गये, जो हर साल औसतन ढाई हजार से अधिक बैठते हैं।

कमोबेश ऐसी ही स्थिति यूपीए सरकार के दौरान सात साल के आंकड़ों में सामने आती है। बताया जाता है कि वर्ष 2007 से 2013 के बीच बेरोजगारी के कारण आत्महत्या करने के 15,322 मामले प्रकाश में आये थे। इस दौरान हर साल आत्महत्या का औसतन आंकड़ा दो हजार से अधिक ही था। हालांकि लोकसभा में राहुल गांधी बेरोजगारी का मुद्दा लगातार उठाते रहते हैं। उनकी दलील है कि वर्तमान में बेरोजगारी की दर पिछले पचास सालों में सर्वाधिक है। वहीं कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने लोकसभा में कहा था कि देश में मौजूदा बेरोजगारी की दर बांग्लादेश की तुलना में तेजी से बढ़ी है। बहरहाल, देश में बढ़ता बेरोजगारी संकट एक बड़े संकट की आहट की तरह भी है जो कालांतर में सामाजिक असंतोष का वाहक बन सकता है। सार्वजनिक मंचों से लगातार कहा जाता रहा है कि भारत युवाओं का देश है, लेकिन नीति-नियंताओं से सवाल किया जाना चाहिए कि हम ऐसा कारगर तंत्र क्यों विकसित नहीं कर पाये हैं जो हर हाथ को काम दे सके।

निस्संदेह, हमारी शिक्षा प्रणाली में भी खोट है, जो बाबू तो बनाती है लेकिन कामकाजी हुनर के मामले में दुनिया से पीछे है। देश में व्याप्त भ्रष्टाचार, आर्थिक असमानता, राजनीतिक विद्रूपता तथा बढ़ती जनसंख्या जैसे कई कारक बढ़ती बेरोजगारी के मूल में हैं, लेकिन देश को इस संकट से उबारना सरकारों का प्राथमिक दायित्व होना चाहिए। हर चुनाव आने पर लाखों-करोड़ों नौकरी देने का वादा तो जोर-शोर से सामने आता है, लेकिन चुनाव के बाद पांच साल तक मुद्दा ठंडे बस्ते में चला जाता है। देश की युवा आबादी को काम देने के लिये वैकल्पिक रोजगार के उपायों पर ठोस काम होना चाहिए। ये घोषणाएं महज सस्ती लोकप्रियता पाने व राजनीतिक लाभ उठाने का जरिया न बनें। यदि समय रहते इस संकट को गंभीरता से संबोधित नहीं किया जाता है तो बेरोजगारी व दिवालिया होने पर आत्महत्या करने वालों का आंकड़ा और बढ़ सकता है, जो देश के लिये अच्छी स्थिति कदापि नहीं कही जा सकती। देश में बेरोजगारी दूर करने के लिये युद्धस्तर पर अभियान चलाने की जरूरत है।

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