Wednesday, May 18, 2022
Home ब्लॉग मुआवजे पर टालमटोल

मुआवजे पर टालमटोल

यह विडंबना ही कही जायेगी कि महामारी में अपनों को खोने की टीस के बीच लोगों को बेहद नाममात्र के मुआवजे हेतु सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने पड़ रहे हैं। यह तार्किक ही है कि देश की शीर्ष अदालत को पिछली कई बार की तरह राज्य सरकारों को फटकार लगाते हुए सख्त टिप्पणी करनी पड़ी। पहली बात तो ऐसे मामलों के प्रति शासन-प्रशासन को संवेदनशील व्यवहार दिखाना चाहिए था और पीडि़तों को कोर्ट जाने की जरूरत ही नहीं पडऩी चाहिए थी।

न्यायमूर्ति एमआर शाह व न्यायमूर्ति संजीव खन्ना की पीठ ने इस मामले में बिहार व आंध्र प्रदेश के मुख्य सचिवों को तलब करके चेताया है कि क्यों न उनके खिलाफ अवमानना की कार्रवाई की जाये। अजीब तमाशा है कि पहले कोर्ट मुआवजा देने को कहता है तो सत्ताधीश इसे देने में असमर्थता जताते हैं। फिर कोर्ट पचास हजार रुपये मात्र की राशि तय करता है तो उसे देने में टालमटोल की जा रही है। सरकारों के लिये यह राहत की बात होनी चाहिए कि उन्हें सिर्फ मृतकों के आश्रितों को ही मुआवजा देना पड़ रहा है। वैसे तो देश के करोड़ों लोगों ने करोड़ों रुपये खर्च करके अपने परिजनों का इलाज कराया, जो कालांतर ठीक हो गये।

निजी अस्पतालों ने जिस तरह इस आपदा में अवसर तलाशा और लाखों के फर्जी बिल बनाये, उसके लिये मुआवजा देने की बात होती तो तब क्या होता। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि तमाम राज्यों में मृतकों के आंकड़ों को लेकर विसंगतियां सामने आ रही हैं। कुछ राज्यों में मृतकों की संख्या कम दर्ज है और दावेदारों की संख्या ज्यादा है। कुछ राज्य ऐसे हैं जहां मृतकों की संख्या ज्यादा है और दावेदार कम हैं। दोनों ही स्थितियां संदेह पैदा करती हैं। कहीं न कहीं प्रशासन मौत के सही आंकड़े दर्ज करने में चूका है। कह सकते हैं कि तंत्र ने अपनी नाकामी छिपाने के लिये सही आंकड़े दर्ज ही नहीं किये। यह स्थिति भी चिंताजनक है कि जब कोरोना महामारी से मरने वालों के आंकड़ों पर शोध किया जायेगा, तो सही तस्वीर सामने नहीं आयेगी।

बहरहाल, यह तय है कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में सरकारें लोक कल्याणकारी राज्य की अवधारणा की कसौटी पर खरी नहीं उतरी हैं। दूसरी लहर के दौरान चिकित्सा सुविधाओं के अभाव व ऑक्सीजन संकट के चलते दम तोड़ते लोगों को दुनिया ने देखा। मीडिया में लगातार इस बात की खबरें तैरती रही हैं कि मरने वालों के वास्तविक आंकड़े सामने नहीं आ रहे हैं। राज्यों द्वारा मरने वालों के आंकड़े और मुआवजा मांगने वाले लोगों के आंकड़ों में विसंगति इस बात की पुष्टि करती है। लेकिन यह बात चौंकाने वाली है कि कुछ राज्यों में मरने वालों की संख्या ज्यादा है और दावेदार कम हैं। कई राज्यों में दावेदारों व मृतकों के आंकड़ों का फर्क दुगने से लेकर सात-आठ गुना तक है जो हमारे तंत्र की पारदर्शिता को बेनकाब करता है।

निस्संदेह, यदि राज्य सरकारों ने मृतकों के आंकड़ों को दुरुस्त किया होता तो आज इस तरह की परेशानी सामने नहीं आती। यह बात जरूर है कि बाद में शीर्ष अदालत ने मृतकों के आंकड़ों के मानकों में परिवर्तन करते हुए उन लोगों को भी मुआवजे का हकदार माना था जो कोरोना संक्रमित होने के एक माह बाद मर गये, चाहे वजह दूसरी बीमारी क्यों न हो। वहीं संक्रमितों द्वारा आत्महत्या करने वालों को भी कोर्ट ने मुआवजे का हकदार माना। बहरहाल, इसके बावजूद शासन-प्रशासन की नेकनीयती पर सवाल तो उठते ही हैं कि पहले से मुसीबत के मारों की मुसीबत में इजाफा ही किया जा रहा है।

यहां यह भी सवाल उठता है कि क्यों लोक कल्याण से जुड़े सामान्य मामलों में कोर्ट को हस्तक्षेप करना पड़ता है। अदालतें पहले ही महत्वपूर्ण मामलों के बोझ से दबी पड़ी हैं और ऐसे मामलों के सामने आने से कोर्ट का कीमती वक्त बर्बाद होता है। मृतकों व मुआवजे के आंकड़ों में विसंगति को देखते हुए एक बात तो साफ है कि महामारी व आपदाओं में मरने वाले लोगों की मौत दर्ज करने के लिये देश में पारदर्शी तंत्र की स्थापना सख्त जरूरी है।

RELATED ARTICLES

मौद्रिक उपाय पर सवाल

भारतीय रिजर्व बैंक ने बढ़ती मुद्रास्फीति पर काबू पाने के लिए मौद्रिक उपाय का सहारा लिया है। पहले कदम के तौर पर उसने ब्याज...

मानव बुद्धि: पहले पंखज्फिर पिंजरे!

हरिशंकर व्यास त्रासद सत्य है जो पृथ्वी के आठ अरब लोग अपना स्वत्व छोड़ते हुए घोषणा करते हैं कि हम फलां-फलां बाड़े (195 देश) के...

सबको पसंद है राजद्रोह कानून

अजीत द्विवेदी भारतीय दंड संहिता की धारा 124ए यानी राजद्रोह कानून पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला ऐतिहासिक है लेकिन यह अंतिम जीत नहीं है। यह...

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Most Popular

ज्ञानवापी मस्जिद को लेकर जारी विवाद के बीच साक्षी महाराज बोले- भगवान विष्णु के मंदिर को तोड़कर बनी है दिल्ली की जामा मस्जिद

ऋषिकेश। उन्नाव सांसद साक्षी महाराज आज मंगलवार को ऋषिकेश में स्थित अपने भगवान आश्रम पहुंचे। पत्रकारों से बातचीत करते हुए साक्षी महाराज ने कहा...

दिल्ली हाईकोर्ट के जज जस्टिस विपिन सांघी होंगे नैनीताल हाईकोर्ट के नए चीफ जस्टिस

नैनीताल। सुप्रीम कोर्ट की कोलेजियम ने दिल्ली हाईकोर्ट के जज न्यायमूर्ति विपिन सांघी को नैनीताल हाईकोर्ट का मुख्य न्यायाधीश नियुक्त करने की सिफारिश की...

सीएम पुष्कर सिंह धामी ने आरटीओ पर मारा छापा, आरटीओ दिनेश पठोई को किया सस्पेंड

सीएम के आर टी ओ कार्यालय में पहुंचने की सूचना से मचा हड़कंप लेटलतीफी और कामों को लटकाने की शिकायतों के बाद सीएम ने किया...

खाई में गिरा वाहन, एसडीआरएफ ने चलाया सर्च एंड रेस्क्यू ऑपरेशन

देहरादून। आज दिनांक 18 मई 2022 को एसडीआरएफ टीम को जिला नियंत्रण कक्ष टिहरी से सूचना मिली की देवप्रयाग से 2 किलोमीटर पीछे एक...

गर्मियों में बचना है लू से तो जरूर अपनाएं ये आसान घरेलू उपाय

गर्मी अकेले नहीं आती, बल्कि अपने साथ-साथ हमें परेशान करने के लिए अन्य कई तरह की समस्याएं भी ले आती है। इन समस्याओं में...

ए.आर. रहमान की पहली फिल्म ले मस्क का कान एक्सआर में होगा प्रीमियर

ग्रैमी विजेता भारतीय संगीतकार ए.आर. रहमान की पहली फीचर फिल्म ले मस्क का कान फिल्म मार्केट के कान एक्सआर प्रोग्राम में वल्र्ड प्रीमियर होगा।...

मौद्रिक उपाय पर सवाल

भारतीय रिजर्व बैंक ने बढ़ती मुद्रास्फीति पर काबू पाने के लिए मौद्रिक उपाय का सहारा लिया है। पहले कदम के तौर पर उसने ब्याज...

चारधाम यात्रा में अव्यवस्थाओं पर भड़के यशपाल आर्य, बोले सिस्टम के नाकारापन के कारण पूरे देश में उत्तराखंड की छवि हो रही खराब

हल्द्वानी। चारधाम यात्रा की व्यवस्थाओं को लेकर नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य ने सरकार पर सवाल उठाए। कहा कि सरकार यात्रियों को बुनियादी सुविधाएं तक...

देहरादून पहुंचा पहाड़ का रसीला खट्टा मीठा फल काफल, जानिए इसके फायदे

देहरादून। सीजन के अंतिम दिनों में ही सही पहाड़ का रसीला काफल देहरादून पहुंच गया है। यह पहाड़ी फल कैंसर समेत कई बीमारियों की रोकथाम...

फर्जी राशन कार्ड धारकों के ख़िलाफ़ खाद्य विभाग की महिमा, “अपात्र को ना और पात्र को हां”, 1967 टोल फ्री नंबर पर करें शिकायत

देहरादून। खाद नागरिक आपूर्ती व उपभोगता मामले मंत्री रेखा आर्या ने आज बनबसा से वर्चुअल माध्यम से खाद्य विभाग की समीक्षा बैठक ली। बैठक में...

Recent Comments