दलेर मेहंदी: फीस का सवाल आया, तो सम्मान की बहस छिड़ गई!
आशीष कुमार ध्यानी
दलेर मेहंदी बड़े कलाकार हैं। उनके गीत बजते ही कदम थिरकने लगते हैं। उनका सम्मान होना चाहिए। बस यह समझ नहीं आया कि इस सम्मान में आयोजकों को सवाल पूछने की अनुमति शामिल है या उसके लिए अलग स्वीकृति लेनी पड़ेगी!
मंत्री सुबोध उनियाल के अनुसार, कुंजापुरी मेले में मोटी फीस के बदले जिस प्रस्तुति की अपेक्षा थी, वह नहीं मिली। उनकी आपत्ति इसी बात पर है। इस सवाल का उत्तर आना चाहिए था, मगर बहस कलाकार के सम्मान पर पहुंच गई।
भई, सम्मान तो पूरा है। सवाल कार्यक्रम का है।
कलाकार के समर्थन में उनके सहयोगियों ने खराब तबीयत का उल्लेख किया है। बीमारी निमंत्रण देखकर नहीं आती और शरीर अनुबंध पढ़कर काम नहीं करता। लेकिन यदि तबीयत पहले से खराब थी और तय प्रस्तुति देना संभव नहीं था, तो शो के लिए हामी क्यों भरी और मोटी फीस क्यों ली?
अचानक तबीयत बिगड़ी थी तो आयोजकों से बात करते, श्रोताओं से क्षमा मांगकर अपनी असमर्थता बताते और फीस की वापसी या समायोजन पर बातचीत करते। उस शाम गाना भले न हो पाता, उनके बड़प्पन की तालियां जरूर बजतीं।
लेकिन मंत्री जी से अपेक्षा कुछ अधिक दिखाई देती है। कलाकार बुलाइए, व्यवस्थाएं कीजिए और प्रस्तुति से असंतुष्ट हों तो मन ही मन रहिए। चेहरे पर मुस्कान बनी रहे। आखिर सवाल पूछकर सांस्कृतिक संध्या में प्रशासनिक व्यवधान क्यों डालना!
कार्यक्रम अच्छा हो तो वाहवाही कलाकार की। अपेक्षाएं अधूरी रहें तो जवाब आयोजक दें। आयोजक कलाकार से पूछ लें तो मामला सम्मान का हो जाए। यह व्यवस्था पहले बता दी जाए तो आयोजक निमंत्रण के साथ मौनव्रत भी धारण कर लें!
दर्शकों की उम्मीदों का भी कोई मान होना चाहिए। लोग उनका नाम सुनकर आए थे, केवल नाम सुनकर लौटने के लिए नहीं। कलाकार के सम्मान में एकजुट हुए लोगों की बात में इन दर्शकों के लिए भी दो शब्द होते तो बहस कुछ अधिक पूरी लगती।
फिलहाल मेजबान के हिस्से में स्वागत, भुगतान और मुस्कान, तीनों अनिवार्य दिखाई देते हैं। बस पूछताछ वाला बटन बंद रहना चाहिए!
सुबोध उनियाल ने वही बटन दबा दिया। पूछा काम का, चर्चा सम्मान की शुरू हो गई। अब कोई इतना तो बता दे, मोटी फीस के साथ अच्छी प्रस्तुति की उम्मीद करना जायज है या अगली बार निमंत्रण पत्र में लिखना पड़ेगा, “आपका आगमन ही कार्यक्रम है, गायन आपकी सुविधानुसार!”

