सीएम हेल्पलाइन: शिकायत ‘In Process’, समस्या Out of Control
रिपोर्ट— आशीष ध्यानी
विनोद, ज़रा दो कप कड़क चाय बना… आज फिर वही पुरानी फाइल खोलनी है, शिकायत की फाइल। फर्क बस इतना है कि इसमें कागज़ नहीं, सिस्टम की सुस्ती की मोटी परत जमी है।
उत्तराखंड सरकार की सीएम हेल्पलाइन… नाम सुनते ही लगता है कि जैसे कोई तेज़-तर्रार व्यवस्था होगी, जहां शिकायत दर्ज करते ही समाधान दौड़ता हुआ आएगा। लेकिन ज़रा जमीनी हकीकत देखिए — यहां शिकायतें “Pending” में सोती हैं, “In Process” में जम्हाई लेती हैं, और “Demand” में अपनी ही कहानी दोहराती रहती हैं।
देहरादून के क्लेमेन्टाउन की एक लेन… जहां सड़क कम, तालाब ज़्यादा नजर आता है। बारिश आई नहीं कि सड़क ने खुद को झील घोषित कर दिया। लोग घर से निकलते नहीं, बल्कि तैरकर बाहर आने की तैयारी करते हैं।
अब मज़ेदार बात सुनिए , इस समस्या की शिकायत एक बार नहीं, दो बार नहीं, बल्कि बार-बार की गई।
10 जुलाई 2025 — शिकायत दर्ज, स्टेटस “Demand”
25 जनवरी 2026 — फिर गुहार, स्टेटस “In Process”
15 मार्च 2026 — फिर वही कहानी, स्टेटस “Pending”
यानी समस्या वहीं की वहीं… बस तारीखें बदलती रहीं और सिस्टम “अपडेट” होता रहा।
विनोद, इसे कहते हैं “डिजिटल विकास”, जहां समस्या ऑफलाइन है और समाधान सिर्फ ऑनलाइन दिखता है।
स्थानीय पार्षद आए, विधायक आए, निरीक्षण हुआ, टीम आई… सबने देखा, समझा, सिर हिलाया और चले गए। लेकिन जल भराव की समस्या? वो आज भी वहीं जस की तस खड़ी है, जैसे सिस्टम को आईना दिखा रही हो।
अब सवाल ये है कि आखिर इस हेल्पलाइन का मतलब क्या है?
क्या ये सिर्फ शिकायत दर्ज करने का डिजिटल डस्टबिन है?
या फिर ये वो जगह है जहां उम्मीदें जाकर “Pending” हो जाती हैं?
सरकारें योजनाओं के बड़े-बड़े पोस्टर लगाती हैं, डिजिटल इंडिया की बातें करती हैं… लेकिन जब एक आम आदमी अपनी समस्या लेकर दरवाज़ा खटखटाता है, तो उसे जवाब नहीं, सिर्फ स्टेटस अपडेट मिलता है।
और सबसे दिलचस्प बात — “In Process” का मतलब यहां काम होना नहीं, बल्कि फाइल का एक टेबल से दूसरे टेबल तक घूमना है।
विनोद, लगता है इस सिस्टम में “जल निकासी” से ज्यादा जरूरत “जवाबदेही निकासी” की है।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की संवेदनशीलता पर किसी को शक नहीं… लेकिन सवाल यह है कि क्या ये संवेदनशीलता सिस्टम के आखिरी पायदान तक पहुंच पा रही है?
क्योंकि जनता अब सिर्फ शिकायत नहीं कर रही…
वो सिस्टम को पढ़ रही है, समझ रही है… और धीरे-धीरे भरोसा खो रही है।।
