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भारत-मालदीव संबंधों में चीन का रुख

विकास कुमार

भारत की दो दिवसीय यात्रा पर पिछले दिनों मालदीव के विदेश मंत्री अब्दुल्ला शाहिद आए । भारत के विदेश मंत्री जयशंकर प्रसाद से हुई वार्ता में उन्होंने कहा हिंद महासागर शांति और सुरक्षा का क्षेत्र है, वहां शांति स्थापित करने के प्रयास किए जाने चाहिए। मालदीव जब ब्रिटिश उपनिवेश से स्वतंत्र (1965) हुआ ,उस समय भारत ने सभी प्रकार के  सहयोग उसको दिया। भारत मालदीव में ही नहीं अपितु अपने संपूर्ण पड़ोसी देशों में लोकतंत्र का समर्थक रहा है। यही मुद्दा रहा है कि जब वहां गैर लोकतांत्रिक सरकारें बनी तो भारत ने उसकी आलोचना की, परंतु चीन ने वहां समर्थन करने का रवैया अपनाया ।1988 में विद्रोहियों द्वारा राष्ट्रपति मामून अब्दुल गयूम के विरुद्ध संघर्ष आरंभ हुआ ,उसी समय भारत ने ऑपरेशन कैक्टस द्वारा विद्रोहियों से मुक्त कराया। प्राकृतिक आपदा के समय भी भारत ने मालदीव का साथ दिया- जैसे -2004 में सुनामी ,2008 में  ज्वरीय आपदा  , 1986 मैं भारतीय प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने यहां इंदिरा गांधी मेमोरियल अस्पताल की स्थापना की।2008 में जब मालदीव में पहली बार चुनाव संपन्न हुए और मोहम्मद नासिर वहां के राष्ट्रपति बने भारत ने इस पहल की प्रशंसा की परंतु 2012 में उनको पद से हटा दिया गया जो पूर्णतया असंवैधानिक था।

भारत ने इस प्रक्रिया की आलोचना की परंतु चीन ने इस प्रक्रिया में चुप्पी साधा रहा । 2014 में जब मोहम्मद अब्दुल्ला यामीन नए राष्ट्रपति बने उन्होंने खुलकर चीन का समर्थन करना प्रारंभ कर दिया। उनका रुख भारत की तरफ ना होकर चीन की ओर बढऩे लगा और उसने अपना निवेश यहां बढ़ाना प्रारंभ कर दिया, प्रमुख कंपनियां यहां पर व्यापार बढ़ाने लगी ।सबसे बड़ी समस्या तो उस समय देखने को मिली जब भारतीय कंपनियां जी 0एम 0आर 0का कॉन्ट्रैक्ट मालदीव ने तोड़ दिया जो 20 वर्षीय था और मुआवजा देने से भी इनकार कर दिया था और वही कॉन्ट्रैक्ट चीन को दे दिया गया। चीन वहां लगातार अपना निवेश बढ़ा रहा है हिंद महासागर  मालदीव मैत्री पुल का निर्माण(2014) किया है । यामीन सरकार ने 2015 में संविधान के अनुच्छेद 251 में संशोधन किया जिसमें यह उपबंध था कि मालदीव की भूमि विदेशियों को सैनिक अड्डा या अन्य कार्य के लिए नहीं दी जाएगी ,परंतु संशोधन करने के बाद यह उपबंध किया गया है कि अब जमीन बेची जा सकती है ।विशेषज्ञों का मानना है कि यहां चीन का सैनिक अड्डा स्थापित करने का द्वार खुल गया है।

वह अपने स्ट्रिंग आफ पर्ल्स (मोतियों की माला की नीति )का हिस्सा भी मालदीप को बना लिया है साथ ही परियोजनाओं पर भी रोड परियोजना पर भी सहमति बना ली है। वह बखूबी जानता है कि भारत का तेल व्यापार लगभग 40त्न हिंद महासागर से होता है और यदि हिंद महासागर पर अपना स्थाई वर्चस्व बनाना है तो मालदीव सबसे बेहतर विकल्प है। क्योंकि यहां से ना सिर्फ वह मार्ग अवरुद्ध कर सकता है ,बल्कि सभी गतिविधियों में पैनी नजर भी रखेगा ।यह भी याद रखने की जरूरत है कि हिंद महासागर में अमेरिका का पहले से एक सैनिक अड्डा डिएगो गार्सिया (1971)है ।क्या चीन यह बराबरी करना चाहता है? या अपने वर्चस्व को बढ़ाने के लिए प्रयास कर रहा है ।मालदीव में लगभग 29000 भारतीय प्रवासी निवास करते हैं जो व्यवसाय और नौकरी में लगे हैं। यहां बांग्लादेश और श्रीलंका के प्रवासी भी निवास करते हैं ,बांग्लादेशी प्रवासियों को पाकिस्तान उ्कसाता है और पाकिस्तान चीन द्वारा वित्त समर्थित है। कुछ यहां पुरानी विचारधारा वाले लोग भी हैं जो उदारीकरण और पर्यटन के प्रगति का विरोध करते हैं ।यही कारण रहा है कि एक बार इजरायल के पयर्टकों को यहां ना आने की धमकी दी गई और उन पर प्रतिबंध भी लगा दिया गया था।

इन नीतियों से यहां का पर्यटन प्रभावित होता है और आय में कमी आती है ।चीन यहां दोनों प्रकार के लोगों का समर्थन करता चला आया है ।भारत भी वर्तमान समय में मालदीव में अपने निवेश को बढ़ा रहा है और अच्छे संबंध कायम किए हैं।  राष्ट्रपति इब्राहिम मोहम्मद सोहेल के राष्ट्रपति बनने के पश्चात ,उनका पूरा झुकाव चीन की ओर नहीं है जैसा यामीन का था। भारत मालदीव और श्रीलंका के बीच एक त्रिपक्षीय वार्ता कुछ दिनों पहले संपन्न हुई थी इस बैठक में भारतीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल श्रीलंका के रक्षा सचिव और मालदीव की रक्षा मंत्री मारिया दीदी ने हिंद महासागर रणनीति को लेकर चर्चा की जो 6 वर्षों के पश्चात संपन्न हुई थी ।भारत यहां 6 .7 किमी लंबा पुल का निर्माण कर रहा है जो चीन  पुल के प्रतिक्रिया  में निर्मित हो रहा है। अभी यहां चीन की बहुत सी कंपनियां अपना निवेश बढ़ा रही हैं और वह भारी भरकम कर्ज के रूप में मालदीव को पैसा दिया है। हालांकि इसकी स्पष्ट जानकारी नहीं है कि चीन ने कितना कर्ज मालदीव को दे रखा है। वहां के केंद्रीय बैंक के गवर्नर का मानना है कि 60 करोड़ अरब डालर  (44.6 37अरब रुपए) का ऋण बकाया है। लेकिन मालदीप की कंपनियों के डेटा के अनुसार 90डॉलर है जबकि पूर्व राष्ट्रपति नशीद का मानना है कि यह धनराशि ऋण 3 अरब डॉलर है कुछ भी हो यही अनुमान लगाया जा सकता है कि चीन ने भारी रकम मालदीव में दी है।

ऐसे में भारत को चाहिए कि वहां संचालित परियोजनाओं को पूरा करने में सक्रियता दिखाएं साथ ही घरेलू नीति और विदेश नीति दोनों को अलग करके देखें क्योंकि मालदीव में अधिकतम नागरिक इजराइल को पसंद नहीं करते हैं और वहां की आबादी अधिकतम मुस्लिम है ,क्योंकि हिंद महासागर से व्यापार के लिए मालदीव का सहयोग अत्यंत आवश्यक है। इस समय उसने भारत के संयुक्त राष्ट्र संघ के स्थाई सदस्यता की सहमति दी है। यह भारत की प्रमुख कूटनीतिक जीत मानी जा सकती है ।परंतु अभी भी वहां चीन का निवेश बराबर बढ़ रहा है यह भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। चीन अपना व्यापार और निवेश वहां बढ़ा रहा है । वह हांगकांग से लेकर सूडान तक के जलमार्ग में अपना दावा पेश कर रहा है।वहां के पूर्व राष्ट्रपति नासिद का मानना है कि यदि मालदीव को अपना विकास करना है तो भारत उसका सबसे बेहतर सहयोगी है । उसकी रणनीति शांति और सही है ना कि विस्तारवादी। सभी संकटों के समय भी भारत ने मालदीव की हर संभव सहायता देने का प्रयास किया है।  भारत ने उसके साथ 363 करोड़ रुपए का लाइन आफ क्रेडिट समझौता किया है जो समुद्री व्यापारिक क्षमता बढ़ाने का एक महत्वपूर्ण आधार हो सकती है। साथ ही भारत ने रोना वैक्सीन की आपूर्ति भी मालदीव में की है। हिंद महासागर में महत्वपूर्ण स्थान बनाने की दृष्टि से इसका  का बहुत महत्वपूर्ण स्थान है । प्रत्येक वर्ष भारत से लाखों पर्यटक यहां में जाते हैं इसलिए भी संबंध प्रगाढ़ करना अत्यंत आवश्यक है।

( लेखक इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजातीय केंद्रीय विश्वविद्यालय अमरकंटक के राजनीति विज्ञान विभाग में रिसर्च स्कॉलर हैं)

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