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बदलते वक्त के साथ तार्किक हो नजरिया

उमेश चतुर्वेदी

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने लड़कियों की शादी की न्यूनतम उम्र सीमा को 18 से बढ़ाकर 21 करने का फैसला क्या लिया, राजनीति शुरू हो गई है। एमआईएमआईएम के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने सवाल उठाया है कि अगर 18 साल की उम्र के युवा मतदान कर सकते हैं तो शादी की उम्र 21 साल क्यों होनी चाहिए। विवादित बयानों के लिए विख्यात समाजवादी पार्टी के सांसद शफीकुर्रहमान बर्क ने इससे भी आगे की बात कही है। उन्होंने कहा है कि लड़कियों की शादी की उम्र सीमा बढ़ाने के बाद वे और ज्यादा आवारगी करेंगी। समाजवादी पार्टी के ही महाराष्ट्र के नेता अबु आजमी तो इस विधेयक को जनसंख्या नियंत्रण की कोशिश से जोडऩे से भी नहीं रुके। झारखंड के भी एक मंत्री ने इस प्रस्तावित कानून का विरोध किया है। झारखंड सरकार के मंत्री हफीजुल अंसारी ने कहा कि लड़कियों की शादी की उम्र बढ़ाने की कोशिश दरअसल असल मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए है। कांग्रेस सांसद शक्ति सिंह गोहिल का कहना है कि उत्तर प्रदेश के चुनाव को देखते हुए भारतीय जनता पार्टी ध्रुवीकरण की राजनीति के तहत लड़कियों की शादी की उम्र बढ़ाने की तैयारी में है।

दरअसल, सरकार ने यह फैसला समता पार्टी की पूर्व अध्यक्ष जया जेटली की अध्यक्षता वाली टास्क फोर्स की सिफारिश पर लिया है। महिला और बाल विकास मंत्रालय ने यह टास्क फोर्स जून, 2020 में गठित की थी। इसके सहअध्यक्ष नीति आयोग के सदस्य वीके पॉल थे। दस सदस्यीय इस समिति में जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय की कुलपति नजमा अख्तर, एसएनडीटी महिला विश्वविद्यालय मुंबई की पूर्व कुलपति वसुधा कामथ और गुजरात की जानी-मानी महिला रोग विशेषज्ञा दीप्ति शाह समेत स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण, महिला व बाल विकास, उच्च शिक्षा, स्कूली शिक्षा एवं साक्षरता मंत्रालयों के सचिव और कानून एवं न्याय मंत्रालय के विधायी विभाग के अधिकारी शामिल थे। इस टास्क फोर्स को शिशु मृत्यु दर, मातृ मृत्यु दर, कुल प्रजनन दर, जन्म के समय लिंग अनुपात, बाल लिंग अनुपात समेत पोषण और स्वास्थ्य से संबंधित तमाम अन्य मुद्दों पर विचार करना था।

वैसे प्रधानमंत्री मोदी ने इस कानून में बदलाव के संकेत पिछले साल के स्वाधीनता दिवस पर लाल किले की प्राचीर से देश के नाम अपने संबोधन में दे दिए थे। तब प्रधानमंत्री ने कहा था, ‘हमने एक कमेटी का गठन किया है, जो यह सुनिश्चित करेगी कि बेटियां अब कुपोषण की शिकार न हों और उनकी शादी सही समय पर हो। जैसे ही कमेटी की रिपोर्ट सामने आएगी, बेटियों की शादी की उम्र के बारे में, उचित फैसले लिए जाएंगे।’
टास्क फोर्स की सिफारिश डॉक्टरों की उस राय पर आधारित है, जिसके मुताबिक पहले बच्चे के जन्म के समय, महिला की उम्र कम से कम 21 साल होनी चाहिए। रिपोर्ट में कहा गया है कि शादी में देरी से परिवारों, महिलाओं, बच्चों और समाज पर सकारात्मक आर्थिक, सामाजिक और स्वास्थ्य संबंधी असर पड़ते हैं। टास्क फोर्स ने दावा किया है कि उसकी रिपोर्ट कम तथा मध्यम आय वाले पचास से ज्यादा देशों से जुटाए गए आंकड़ों पर आधारित है। टास्क फोर्स ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि उन शिशुओं की सेहत खराब होने का खतरा कम रहता है, जिस महिला की उम्र पहले बच्चे के जन्म के वक्त 27 से 29 वर्ष होती है। टास्क फोर्स ने माना है कि मां बनने की आदर्श आयु 21 से 35 वर्ष के बीच की होती है। इसके बावजूद इस प्रस्तावित कानूनी बदलाव के बाद एक सवाल मुंहबाए खड़ा रहेगा। दरअसल, सहमति से शारीरिक संबंध की कानूनी उम्र सीमा 18 साल है। जाहिर है कि जब शादी की न्यूनतम उम्र 21 साल की जाएगी तो सहमति वाला यह प्रावधान भी आड़े आएगा। सवाल यह उठेगा कि क्या बिना शादी के सहमति से बनाये गये संबंध जायज हैं या नहीं। लेकिन टास्क फोर्स ने इस पर आलोचनात्मक नज़रिया अपनाने की बजाय यौन काउंसलिंग और यौन शिक्षा पर फोकस करने पर जोर दिया है।

दरअसल, अभी लड़कियों की शादी की वैधानिक उम्र 18 साल है, जबकि लडक़ों की 21 साल निर्धारित है। वैसे 1872 के पहले तक विवाह के लिए अपने देश में कोई कानून नहीं था। इस कारण बाल विवाह भी खूब होते थे। समाज सुधारकों की मांग पर अंग्रेज सरकार ने 1872 में नेटिव मैरिज एक्ट पारित किया। इस कानून के मुताबिक 14 वर्ष से कम उम्र वाली लड़कियों की शादी पर पाबंदी लगा दी गई। इसके बाद साल 1891 में सम्मति आयु अधिनियम पारित किया गया, जिसके तहत 12 वर्ष से कम आयु वाली लड़कियों के विवाह पर रोक लगा दी गई। बहुचर्चित शारदा अधिनियम 1930 में पारित हुआ। इस अधिनियम ने पहली बार शादी की उम्र को स्वास्थ्य के आधार पर तार्किक बनाने की कोशिश की। इसके तहत 18 वर्ष से कम आयु के लडक़ों और 14 वर्ष से कम आयु की लड़कियों की शादी को अवैध घोषित कर दिया गया। इसके बाद आजादी के बाद 1954 में विशेष विवाह अधिनियम आया, जिसमें विवाह के लिए लड़कियों की उम्र 18 और लडक़ों की उम्र 21 वर्ष निर्धारित की गई।

बहरहाल, शादी के कानूनों में प्रस्तावित इस विवाद के बावजूद लगता नहीं कि सरकार पीछे हटने के मूड में है। हाल ही में हिमाचल प्रदेश के मंडी में एक सभा में प्रधानमंत्री ने कह भी दिया कि जब हर मौके पर बराबरी की बात होती है तो शादी के लिए बराबरी की बात क्यों न हो।

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