Wednesday, May 18, 2022
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चुनाव चिन्ह जब्त तब कांग्रेस का क्या?

हरिशंकर व्यास

इसे कल्पना न मानें। नोट रखें नरेंद्र मोदी हैं तो सब मुमकिन है। सोनिया गांधी और राहुल गांधी भले ऐसी कल्पना नहीं करें पर मोदी सरकार के लिए चुटकियों का काम है। हां, कांग्रेस में विद्रोह कराना, विद्रोहियों का एक पत्र चुनाव आयोग पहुंचवाना और फिर आयोग से चुनाव चिन्ह की जब्ती सब बहुत आसान। तब सोनिया-राहुल गांधी सुप्रीम कोर्ट या कहीं भी जाएं तो सुनवाई नहीं होगी। ज्यादा से ज्यादा नया चुनाव चिन्ह मिल जाएगा। उसकी अफरा-तफरी में सोनिया-राहुल क्या 2024 का लोकसभा चुनाव मनोबल से लड़ सकेंगे? इतना ही नहीं, संभव है जो विद्रोही अपने को ‘सबकी कांग्रेस’ घोषित कर सरकार की मदद से एआईसीसी के दफ्तर को अपना मुख्यालय घोषित करके राहुल-सोनिया की तख्तियां हटा दें। तब कितने कांग्रेसी विरोध में सडक़ पर संघर्ष करते हुए होंगे? क्या अखबार-टीवी चैनलों पर कोई परिवार के लिए बोलता हुआ होगा? उलटे देश में नैरेटिव होगा कि कांग्रेस परिवारवाद से मुक्त हुई! सोचें, राहुल-प्रियंका अनशन-धरने पर बैठें तो उनके साथ प्रदर्शन में कितने लोग होंगे? राहुल गांधी अपने संगठन मंत्री वेणुगोपाल या सलाहकार-सहयोगी सचिन राव, कनिष्क सिंह, कन्हैया आदि से फोन करवा कर कार्यकर्ताओं को इकठ्ठा होने के लिए कहें तो दिल्ली में कितने हजार लोग जुटेंगे? क्या हुड्डा साथ होंगे? परिवार के लिए वे कितने सेकुलर, दलित, मुसलमान जुटेंगे, जिनकी चिंता में सोनिया-राहुल ने अपने को हिंदू जनभावनाओं से अलग करके रखा है!

मेरा मानना है नरेंद्र मोदी परिवारवादियों से मुक्ति के रोडमैप पर लगातार काम कर रहे हैं। कांग्रेस अब क्योंकि खत्म (चार चुनावों के ताजा परिणाम) होती हुई मानी जा रही है तो नोट रखें दिसंबर 2023 तक कांग्रेस लगातार हारते हुए होगी। मोदी-शाह आप को बढऩे देंगे, दूसरों को खेला करने देंगे लेकिन कांग्रेस को लोकसभा चुनाव से पहले कहीं नहीं जीतने देंगे। इसलिए विधानसभा चुनावों के बाद का समय ‘सबकी कांग्रेस’ का पटाखा फोड़ परिवार विरोधी कांग्रेसियों के लिए आदर्श है। (यों मोदी हैं तो पहले भी संभव है!) यदि कांग्रेस नवंबर-दिसंबर 2023 के चुनाव में एक-दो राज्य भी नहीं जीत पाई तो सोनिया-राहुल के लिए लोकसभा चुनाव से पहले चुनाव चिन्ह बचाना मुश्किल होगा।

सवाल है नरेंद्र मोदी-संघ परिवार क्यों कांग्रेस से गांधी-नेहरू परिवार की मुक्ति चाहते हैं? (जवाब का खुलासा में बाद में कभी करूंगा)। प्राथमिक कारण है कि कांग्रेस नाम के ब्रांड का खूंटा ज्योंहि सोनिया-राहुल-प्रियंका याकि परिवार से मुक्त हुआ तो संघ परिवार के लिए हमेशा के लिए कांग्रेस का झंझट खत्म। तभी अगले डेढ़ साल निर्णायक हैं। पिछले आठ सालों में मोदी-शाह की रणनीति ने होशियारी से पहला काम यह किया कि सोनिया गांधी के पुत्र मोह की मंशा को समझ कर राहुल गांधी पर नैरेटिव बनवाया कि राहुल गांधी काबिल नहीं हैं। दूसरे दिवंगत अहमद पटेल के ब्रेनवास से शायद सोनिया गांधी ने माना कि प्रियंका ने कमान संभाली तो राबर्ट वॉड्रा के कारण मोदी सरकार कहर बरपा देगी। इसलिए प्रियंका हाशिए में ही रहें। मेरा मानना है कि अहमद पटेल के कारण ही प्रियंका को यूपी में खपा कर उनकी सियासी संभावना खत्म कराने का तानाबाना बुना गया।

गहराई से सोचें यूपी के ताजा नतीजों के बाद लोगों के दिल-दिमाग में क्या प्रियंका उसी तरह फेल नहीं समझी जा रही हैं, जैसे राहुल गांधी का नैरेटिव है। यदि प्रियंका चुनावों से दूर रहतीं तो परिवार के पास एक विकल्प बंद मुठ्ठी लाख का होता। अहमद पटेल का दिमाग था जो राहुल यदि पप्पू तो प्रियंका की संभावना भी बेमतलब। ऐसा सोचना उनका कैसे हुआ, यह ईश्वर जानें। सभंव है राहुल गांधी की जिद्द के चलते सदिच्छा से प्रियंका को यूपी सुपुर्द करा कर सोचा हो कि वे वहां सफल होगी तो अपने आप उनकी लीडरशीप बनेगी। तभी अपना मानना रहा है कि सोनिया गांधी के वक्त में अहमद पटेल से कांग्रेस की बरबादी अधिक हुई और भलाई कम। हालांकि यह भी सही है कि सोनिया गांधी के पास उन जैसा भरोसेमंद मैनेजर दूसरा नहीं था।
बहरहाल, ताजा चुनाव नतीजों के बाद राहुल गांधी की तरह प्रियंका गांधी भी अब नेहरू के आइडिया ऑफ इंडिया वाले मोदी विरोधियों की उम्मीद की किरण नहीं हैं। इसलिए मोदी-शाह की रणनीति में कांग्रेस को तोडऩे, उसे विपक्ष में बेगाना बना कर परिवार से मुक्त कराने का वक्त आया हुआ है। इसका खटका कुछ सोनिया-राहुल-प्रियंका को भी हुआ लगता है। तभी विधानसभा चुनाव के नतीजे आए नहीं और तुरंत कार्य समिति की बैठक बुलाकर दुनिया को बतलाया कि पार्टी में सब ठीक है। मगर इससे कुछ नहीं होना है। पार्टी में कलह बढ़ती जाएगी। असंतुष्टों को शह मिलेगी और हौसले बढ़ेंगे। कांग्रेस के विपक्ष में अलग-थलग बनने, उसके खत्म होने का परसेप्शन बढ़ेगा।

क्या राहुल गांधी ऐसा संकट विजुअलाइज कर सकते हैं? काउंटर रणनीति बना सकते हैं? दिक्कत है कैसे बनाएं? उनके पास है कौन? किनसे उनका इटंरेक्शन है? क्या वेणुगोपाल, सचिन राव, कन्हैया जैसों से चल रहे दफ्तर और दिमाग के बूते वे परिवार की कांग्रेस विरासत बचा सकते है? सोनिया गांधी की उम्र और मजबूरी समझ आती है लेकिन राहुल गांधी बचपन से इंदिरा गांधी, राजीव गांधी के वक्त का कांग्रेस परिवेश देखते हुए है। याद करें इंदिरा-राजीव की एआईसीसी और पीएमओ को। उस वक्त जैसा एक भी चेहरा क्या आज सोनिया-प्रियंका-राहुल की एआईसीसी, घर-दफ्तरों में है? कांग्रेसी बताते है कि अहमद पटेल के वक्त से भी अधिक अब बेपैंदे वाले, रियलिटी से कटे और मेल-मुलाकात के काम में भी दुकान लगाए राहुल की टीम है। भाजपा के सांसदों, कार्यकर्ताओं के लिए मोदी-शाह, नड्डा से मिलना आसान है लेकिन कांग्रेसियों के लिए सोनिया-राहुल-प्रियंका से मिलना ज्यादा मुश्किल।

हो सकता हैं मैं गलत हूं लेकिन मेरा मानना है कि पिछले आठ वर्षों में सोनिया-राहुल-प्रियंका ने एक भी दफा अनुभवियों, खाटी राजनीतिबाजों को बैठा कर विचार नहीं किया होगा कि मोदी-शाह की चुनावी-सियासी सफलता के क्या-क्या गुर है? कैसे मोदी-शाह को हराया जा सकता है? कभी इस तरह विचार नहीं हुआ होगा। ले देकर राहुल और उनके आंकड़ा विश्लेषक, उनके विचारक पुराने फॉर्मूलों, दिमाग के आग्रह-पूर्वाग्रह में राजनीति करते है। इस पुराने ढर्रे में पार्टी को चुनाव लड़ाते हैं कि लोग महंगाई, बेरोजगारी से तंग आ कर वोट देंगे। सांप्रदायिकता के खिलाफ खड़े होंगे। प्रियंका को देख कर महिलाओं का रूझान बनेगा। चन्नी दलित हैं तो दलित वोट देंगे। अशोक गहलोत, भूपेश बघेल काम कर रहे हैं तो राजस्थान, छतीसगढ़ में फिर सरकार बनेगी या भाजपा के पास चेहरा नहीं तो अपने पुराने चेहरे हरीश रावत को उत्तराखंड में उतारने से जीत जाएंगे या गुजरात में पच्चीस साल हो गए भाजपा को तो इस दफा वहा एंटी इनकम्बेंसी से कांग्रेस जीतेगी! इससे भी बड़ा राहुल गांधी का यह स्थायी ख्याल बताया जाता है कि कभी न कभी तो मोदी हारेंगे तो इसलिए पार्टी को कन्हैया जैसे संघर्षशील, कमिटेड चेहरों की टीम चाहिए। उनसे कांग्रेस चलेगी!

सचमुच खाटी कांग्रेसियों की हताशा के कई आधार हैं। इन बिंदुओं पर गौर कंरे:–(1) राहुल गांधी सप्ताह में सातों दिन चौबीसों घंटे राजनीति नहीं करते। इसलिए मोदी-शाह-भाजपा-संघ परिवार की चौबीसों घंटे राजनीति व चुनावी धुन के आगे कांग्रेस क्या करें? (2) खुद राहुल के राजनीतिबाज नहीं होने के कारण उनके ईर्द-गिर्द नौकरशाह किस्म के विचार प्रबंधकों का घेरा बना है। ये अभी भी दलित, मुस्लिम, पिछड़ों की मंडलवादी-वामपंथी गणित में टिकट तय कराते हैं। सॉफ्ट हिंदुत्व से नुकसान का दिमाग बनाते हैं। (3) राहुल गांधी न हिंदी भाषण में धुरंधर (मोदी की तरह क्यों नहीं टेलीप्राम्प्टर की आदत बनाते?) हैं और न उत्तर भारत के खांटी कांग्रेसी नेताओं के लिए बातचीत का दरवाजा खुला रख, उनसे फीडबैक लेने, उनसे लगातार संपर्क बनाए रखने, जोश फूंकने पर ध्यान देते हैं। न ही उनके उपयोग का दफ्तर में कम्युनिकेशन कौशल है। उलटे कांग्रेस मुख्यालय, संगठन का जिम्मा उन वेणुगोपाल को दे रखा है, जो न हिंदी बोल सकते हैं और न उत्तर भारत के खांटी-चुनावबाज नेताओं से वैसा मेल-जोल बना सकते हैं, जैसा अहमद पटेल, फोतेदार या आरके धवन या वी जॉर्ज बनाए होते थे। सबसे बड़ी बात शरद पवार, उद्धव ठाकरे से ले कर ममता बनर्जी, केजरीवाल आदि विपक्षी नेताओं से राहुल गांधी की कैसे वह केमिस्ट्री बने जो 2024 के चुनाव के ग्रैंड एलायंस के ताने-बाने में जरूरी है।

न सोचें कि मैं राहुल गांधी को फेल करार दे रहा हूं इसलिए जी-23 के गुलाम नबी, कपिल सिब्बल एंड पार्टी की गैर-परिवार नेता को लीडरशीप देने की मांग सही है। पहली बात, राहुल गांधी में कमियां हैं तो वह हिम्मत भी है, जिससे वे नरेंद्र मोदी के आगे बोलते हैं। पिछले आठ सालों में राहुल गांधी ने जिस बेबाकी से मोदी सरकार की नीतियों, भ्रष्टाचार, लोगों की बेहाली, अडानी-अंबानी के खिलाफ बोला है और जो निर्भयता दिखाई है वैसा किसी दूसरे विपक्षी नेता में साहस नहीं है। राहुल गांधी का मिजाज जाहिर करता है कि वे सत्ता के भूखे नहीं हैं। वे सहज-सरल और अपनी फितरत में जीते हैं। उस नाते अखिल भारतीय पार्टी के बतौर नेता राहुल गांधी की खूबियां मामूली नहीं हैं।

बावजूद इसके राजनीतिक दल का जिंदा रहना चुनाव जीतने की ऑक्सीजन पर निर्भर है और चुनाव जीतना नेता के कम्युनिकेशन, भाषण, चेहरे की भाव-भंगिमा, अभिनय, जमीनी सच्चाईयों में व्यवहार, सियासी सूझ-बूझ, चतुराई आदि से होता है। इसलिए परिवार के लिए अब फैसले का वक्त है। न कांग्रेस केवल, बल्कि देश के सेकुलर आइडिया ऑफ इंडिया को जिंदा रखने के लिए भी सोनिया-राहुल-प्रियंका को अनिवार्यत: फैसला करना चाहिए। सोनिया गांधी को परिवारवादी कांग्रेस को खत्म करने के नरेंद्र मोदी के मिशन का खतरा समझ कर और सन् 2024 के आर-पार के चुनाव की रियलिटी में संगठन पूरी तरह प्रियंका गांधी को सौंप देना चाहिए। दूसरा कोई विकल्प नहीं है। खडग़े, कमलनाथ, गहलोत, दिग्विजय, वासनिक आदि में से किसी से भी कुछ नहीं हो सकेगा। ऐसी कोई गलती नहीं करें। नरेंद्र मोदी का मिशन 2024 के चुनाव तक परिवारमुक्त कांग्रेस बना पूरे देश से कांग्रेस के सफाए का है। खुद राहुल गांधी को प्रियंका गांधी को कमान सौंपने की जिद्द बना कर अपने को अलग मिशन में झौकना चाहिए। मतलब मोदी सरकार की पोल खोल के साहसी अभियान का मिशन। सोनिया-राहुल-प्रियंका तीनों को समझ लेना चाहिए कि पिछले आठ सालों में भाजपा-संघ परिवार और नरेंद्र मोदी ने राहुल गांधी को पप्पू प्रचारित किया तो प्रियंका को यूपी से फेल बनाया। तभी दोनों को नए ढंग, नए ओरिएंटेशन से पब्लिक मूड के माफिक रोल बनाना चाहिए। प्रियंका गांधी यदि कांग्रेस की अध्यक्ष नहीं बनीं तो पार्टी के भीतर विभीषणों की भीड़ बनेगी। जी-23 के नेताओं से बात या सुलह से कुछ नहीं होगा। कांग्रेस आगे के विधानसभा चुनाव कायदे से नहीं लड़ पाएगी। वह हर विधानसभा चुनाव हारेगी। परिवार पर ठीकरा फूटता जाएगा और लोकसभा चुनाव से ऐन पहले चुनाव चिन्ह जब्त!

हां, सोनिया गांधी को इस्तीफा देना चाहिए। प्रियंका गांधी को अध्यक्ष बना कर, उनके जरिए पूरी एआईसीसी, प्रदेश अध्यक्षों को बदलवा कर पार्टी के कायाकल्प का मैसेज बनवाना होगा तभी विपदा टलेगी।

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