उत्तराखंड

उत्तराखंड: पहाड़ और पहाड़ियों की अस्मिता पर प्रश्न क्यों?

“चलो कहीं दूर निकल जाएं, जहां पहाड़ों की गोद में बचपन फिर से खिल जाए।”

आशीष ध्यानी

उत्तराखंड केवल एक भूभाग नहीं है, यह एक विचार है। यह उन संघर्षों का प्रतीक है जो हमारे पूर्वजों ने झेले, यह उन बलिदानों की गाथा है जिनके कारण हमारा यह पहाड़ी राज्य अस्तित्व में आया। मगर विडंबना यह है कि आज जब कोई पहाड़ और पहाड़ियों की अस्मिता की बात करता है तो उसे संकीर्ण मानसिकता का कह दिया जाता है। क्यों? क्या पहाड़ और पहाड़ियों की बात करना अपराध हो गया है?

उत्तराखंड की आत्मा पहाड़ और पहाड़ी लोग हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि उत्तराखंड का निर्माण पहाड़ों और पहाड़ी समुदायों के हक की रक्षा के लिए हुआ था। अगर उत्तराखंड केवल एक प्रशासनिक इकाई बनना था, तो फिर उत्तर प्रदेश से अलग होने का औचित्य ही क्या था? क्या हमारा राज्य केवल एक नाम मात्र का पहाड़ी प्रदेश है? या फिर इसका वास्तविक उद्देश्य उन पहाड़ों और वहां के मूल निवासियों की समस्याओं को हल करना था?

लेकिन आज स्थिति यह है कि पहाड़ और पहाड़ियों की बात करना ही ‘विवादास्पद’ बना दिया गया है। जब कोई उत्तराखंड की अस्मिता की रक्षा की बात करता है, तो उसे ‘पहाड़-मैदान’ की राजनीति का आरोप झेलना पड़ता है।

राज्य बनने के 24 साल बाद भी हमारे पहाड़ी क्षेत्रों में मूलभूत सुविधाओं की भारी कमी है। सड़कें टूटी-फूटी हैं, स्वास्थ्य सेवाओं में आमूल-चूल परिवर्तन की आवश्यकता है, शिक्षा की हालत भी बहुत अच्छी नहीं है। पहाड़ों का खाली होना, पलायन की बढ़ती दर और बंजर होते खेत—क्या यह किसी बड़े संकट का संकेत नहीं?

कोई अन्य राज्य अपने स्थानीय नागरिकों की बात करे तो वह प्रगति कहलाता है, लेकिन उत्तराखंड में अगर कोई पहाड़ और पहाड़ी अस्मिता की बात करे, तो उसे संकीर्ण मानसिकता का करार दिया जाता है। आखिर क्यों? क्या अन्य राज्यों में वहां की लोकसंस्कृति, परंपरा और त्योहारों को संजोने के प्रयास नहीं किए जाते? क्या वहां के स्थानीय लोगों को प्राथमिकता नहीं दी जाती? फिर उत्तराखंड में ही यह अपराध जैसा क्यों?

“लहू से सींचा जिस मिट्टी को, वो आज पराई हो गई, हम अपनों में ही अजनबी से, ये कैसी रीत निभाई गई।”

उत्तराखंड मूल के कई लोग भी रोजी-रोटी की तलाश में अन्य प्रदेशों में बसे हैं। कई राज्यों में तो इनकी तादाद भी अच्छी खासी है। लेकिन क्या कहीं हमारे लोक पर्वों या किसी अन्य सांस्कृतिक उत्सव को मान्यता मिली है? क्या किसी राज्य सरकार ने इन्हें मान्यता देकर अवकाश घोषित किया है? यदि नहीं, तो फिर उत्तराखंड में पहाड़ों की अस्मिता की बात करना अपराध कैसे हो गया?

उत्तराखंड में रहने वाले हर व्यक्ति का सम्मान है। हर कोई यहां आकर अपनी आजीविका कमा सकता है, अपना भविष्य संवार सकता है। मगर इस प्रदेश की आत्मा पहाड़ और पहाड़ी लोग हैं, और उनके अस्तित्व, अस्मिता और अधिकारों का सम्मान किया जाना चाहिए। अगर आप इस धरती से लाभ उठा रहे हैं, तो इसके मूल नागरिकों के प्रति संवेदना और समर्पण भी दिखाना होगा।

यह राज्य किसी विशेष समुदाय के विरोध में नहीं बना, बल्कि अपने पहाड़ों और उनकी अस्मिता की रक्षा के लिए बना है। इसलिए, इस प्रदेश में रहने वालों को भी इसे केवल संसाधनों की भूमि नहीं, बल्कि एक जीवंत परंपरा और संस्कृति के केंद्र के रूप में देखना चाहिए। पहाड़ों की आवाज उठाना किसी का विरोध नहीं, बल्कि न्याय की मांग है।

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