उत्तराखंड

“रसूखदार मधुशाला: रोमियो लेन का असली रोमांस!”

“एक पहाड़ी देश की राजधानी में एक रोमियो लेन है बल… अरे, मतलब एक सड़क है, बड़ी पॉपुलर! नाम है रोमियो लेन! और वहीं है वो ‘रसूखदार मधुशाला’,” आशीष ने चाय की चुस्की लेते हुए विनोद को छेड़ा।

“अरे वही वाली? जो सील हुई थी और फिर चुटकी बजाते ही खुल भी गई?” विनोद ने आँखें मिचकाईं।

“अबे हां! तभी तो नाम रोमियो लेन की मशहूर ‘रसूखदार मधुशाला’!” समझ गए न मशहूर का मतलब विनोद, आशीष ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया। “लेकिन विनोद, यार, मैं सोच रहा था—एक पहाड़ी देश की राजधानी में मधुशालाएँ बहुत हैं, फिर सिर्फ यही वाली इतनी ‘रसूखदार’ क्यों?”

“मतलब?” विनोद ने चाय का कप घुमाते हुए पूछा।

“मतलब ये कि क्या इसमें किसी माननीय का पैसा लगा है? वैसे चर्चा तो यही है कि यहाँ बड़े-बड़े साहब लोगों का खूब आना-जाना है… अब ये ‘बड़का साहब‘ यहाँ ग़म गलाने आते हैं या जेब गरमाने? यानी क्लाइंट बनकर पीते हैं या फिर पार्टनर बनकर? ये तो वही जानें, लेकिन चर्चा आम है कि संरक्षण शुल्क ठीक-ठाक ही जाता था!”

“अब सबसे बड़ा सवाल ये है, विनोद!” आशीष ने आवाज धीमी कर conspiratorial अंदाज़ में कहा, “अब जब सील होने और फिर खुलने का खेल खत्म हो चुका है, तो क्या इसका व्यवहार बदलेगा?”

“मतलब?” विनोद ने चौंककर पूछा।

“मतलब, क्या अब ये समय पर बंद होगी, या फिर पहले की तरह देर रात तक नियमों को ठेंगा दिखाकर कान फोड़ू संगीत बजाएगी?”

विनोद ने गहरी सांस ली। “बड़ा सवाल है, भैया…”

“हां! बहुत बड़ा सवाल है कि इस ‘रसूखदार मधुशाला’ का रसूख आखिर कहां तक जाएगा?”

“इंतज़ार कीजिए…!”

आशीष और विनोद की चाय की चुस्कियों के साथ रोमियो लेन की ‘रसूखदार मधुशाला’ पर बातचीत का दौर अभी खत्म नहीं हुआ है।

कौन बचा रहा है? कौन चला रहा है? कौन पी रहा है और कौन पिला रहा है?

क्या इस मधुशाला का रसूख यूं ही बना रहेगा या कभी गिरेगा भी?

बने रहिए, क्योंकि कहानी में अभी और ट्विस्ट बाकी हैं!

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