उत्तराखंड

विश्वास में ‘विष’ का वास!

आशीष ध्यानी

आस्था पर चोट! श्रद्धा से व्रत कर रहे थे, मिलावटी कुट्टू खा गए– 345 पहुंच गए थे अस्पताल! जिम्मेदार कौन!

नवरात्र—आस्था, भक्ति और तपस्या का पर्व। लाखों श्रद्धालु मां की भक्ति में लीन थे, व्रत रख रहे थे, फलहार कर रहे थे। लेकिन क्या उन्हें पता था कि जिस कुट्टू के आटे को से वे अपना व्रत खोल रहे थे, वह उनकी सेहत के लिए ‘ज़हर’ साबित होगा? देहरादून में मिलावटी कुट्टू का आटा खाने से 345 लोग अस्पताल पहुंचे! कई लोग अभी भी अस्पताल में भर्ती हैं! क्या यह सिर्फ एक हादसा है या फिर प्रशासन की घोर लापरवाही, उदासीनता का जीता-जागता प्रमाण है।

हर साल नवरात्र के दौरान कुट्टू के आटे की खपत कई गुना बढ़ जाती है। खाद्य सुरक्षा विभाग का यह कर्तव्य था कि वह पहले से ही सतर्क होता और कुट्टू के आटे की गुणवत्ता की सख्त जांच करता। लेकिन क्या ऐसा हुआ? प्रशासन ने आंखें मूंदे रखीं, न ही किसी तरह की मॉनिटरिंग हुई और न ही कोई एडवाइजरी जारी की गई। सवाल यह है कि जब हर साल त्योहारों पर मिलावटी सामान बिकता है, तो इस बार भी क्या प्रशासन को हादसे का इंतजार था?

देहरादून में मिलावटी कुट्टू खाने से जब 345 लोग बीमार पड़ गए, तब जाकर प्रशासन जागा। लेकिन सवाल यह है कि क्या खाद्य सुरक्षा विभाग का काम सिर्फ हादसों के बाद दिखावटी कार्रवाई करना है? क्या नवरात्र से पहले कुट्टू के आटे के सैंपल लिए गए? अगर हां तो फिर इतनी बड़ी चूक कैसे हुई! और अगर नहीं लिए गए तो क्यों नहीं लिए गए! क्या खाद्य सुरक्षा विभाग सिर्फ कागजों में सक्रिय रहता है। जब दुकानों पर मिलावटी कुट्टू का आटा बिक रहा था, तब जिम्मेदार अधिकारी कहां थे? क्या सरकार ने त्योहारों से पहले खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए कोई SOP (Standard Operating Procedure) लागू है? अगर SOP थी, तो उसे लागू क्यों नहीं किया गया? और अगर SOP नहीं है, तो इतने बड़े हादसे के बाद भी क्या कोई ठोस नीति बनेगी?

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को जैसे ही घटना की जानकारी मिली, वे तुरंत एक्शन में आए। खुद अस्पताल पहुंचे, मरीजों से बातचीत की और अधिकारियों की लापरवाही पर जमकर नाराजगी जताई। सीएम धामी ने स्पष्ट आदेश दिए कि मिलावटखोरों के खिलाफ सख्त कार्रवाई हो, दोषियों पर तत्काल FIR दर्ज की जाए और किसी भी कीमत पर इस लापरवाही को बख्शा न जाए। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या सिर्फ मिलावटखोरों पर कार्रवाई करने से समस्या हल हो जाएगी? क्या उन अफसरों पर भी कार्रवाई होगी जो अपनी जिम्मेदारी निभाने में पूरी तरह विफल रहे? क्योंकि अगर समय रहते खाद्य पदार्थों की सही जांच होती, तो यह स्थिति ही नहीं आती।

यह पहली बार नहीं है जब मिलावटी सामान खाने से लोगों की जान पर बन आई हो। हर साल त्योहारों और उपवास के दौरान मिलावटी सामान बाजार में खुलेआम बिकता है, लेकिन सरकारी तंत्र तब तक सोता रहता है, जब तक कोई बड़ा हादसा न हो जाए। क्या प्रशासन अब भी जागेगा? या फिर यह मामला भी कुछ दिनों में ठंडे बस्ते में चला जाएगा? क्या खाद्य सुरक्षा विभाग केवल हादसों के बाद सक्रिय होने के लिए बना है? अगर नवरात्र शुरू होने से पहले खाद्य पदार्थों की सैंपलिंग होती, मिलावटी कुट्टू की पहचान कर इसे बाजार से हटाया जाता, तो सैकड़ों लोग अस्पताल नहीं पहुंचते

अब प्रशासन को यह जवाब देना होगा कि क्या इस बार भी सिर्फ लीपापोती होगी, या फिर कोई ठोस नीति बनेगी, जिससे भविष्य में ऐसा हादसा न हो? क्या सरकार अब त्योहारों और उपवास के दौरान बिकने वाले खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए कोई स्थायी और सख्त व्यवस्था करेगी?

अब वक्त आ गया है कि सिर्फ दुकानदारों को ही नहीं, बल्कि उन अफसरों को भी कटघरे में खड़ा किया जाए, जिनकी लापरवाही से श्रद्धालुओं की आस्था पर बार-बार चोट हो रही है। क्या इस मामले में खाद्य सुरक्षा विभाग के अफसरों की भूमिका की भी जांच होगी? क्या सिर्फ मिलावटखोरों पर कार्रवाई होगी, या फिर वे अधिकारी भी नपेंगे जिन्होंने अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाई? क्या सरकार इस बार सच में सख्ती से पेश आएगी, या फिर यह मामला भी पुरानी फाइलों में दबकर रह जाएगा?

यह हादसा सिर्फ एक चेतावनी नहीं, बल्कि एक बड़ा सबक है। अगर प्रशासन अब भी नहीं जागा, तो आगे भी ऐसी घटनाएं दोहराई जाएंगी और हर साल हजारों लोग जहरीला खाना खाकर बीमार पड़ते रहेंगे। अब वक्त आ गया है कि सिर्फ मिलावटखोरों पर कार्रवाई न हो, बल्कि उन अधिकारियों पर भी शिकंजा कसा जाए, जिनकी नाकामी की वजह से यह त्रासदी हुई।

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