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आज़ादी सिर्फ मिली नहीं, हर दिन निभानी है — एक सोच, एक बदलाव

एक सोच एक बदलाव

आज़ादी… सिर्फ तिरंगा लहराने की नहीं… सोच बदलने की भी होनी चाहिए।

अगर एक लड़की आज भी घर लौटते वक्त… अपनी लोकेशन भेजकर चलती है… तो… हमें अभी थोड़ी और आज़ादी चाहिए।

अगर कोई अपने हक की बात करे… और उसे चुप करा दिया जाए… तो… हमें अभी थोड़ी और आज़ादी चाहिए।

अगर… सोशल मीडिया पर सवालों का जवाब… गलियों से दिया जाता है… तो… हमें अभी थोड़ी और आज़ादी चाहिए।

आज़ादी… ट्रेंड बनाने की नहीं बदलाव लाने की हो। आज़ादी… भीड़ के पीछे चलने की नहीं अपनी सोच बनाने की हो।

आज़ादी… नफ़रत फैलाने की नहीं एक-दूसरे को समझने की हो। आज़ादी… आवाज़ उठाने की नहीं किरदार ऊँचा करने की हो।

क्योंकि… देश को आज़ाद हुए 79 साल हो गए। लेकिन अगर आज भी हम डर में जी रहे हैं… नफ़रत में बँट रहे हैं…

और सोचने से पहले एक-दूसरे को जज कर रहे हैं… तो… शायद अब भी एक आज़ादी बाकी है।

डर से आज़ादी। नफ़रत से आज़ादी। चुप्पी से आज़ादी। और… सबसे ज़्यादा… बंद सोच से आज़ादी।

यही होगा… आज़ादी का अगला क़दम।

Gunjan Sachdeva

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