“खाकी के घोड़े और चने का चमत्कार!”
आशीष ध्यानी
“विनोद, दो कड़क चाय लाओ… और हां, एक अदद कानों के लिए भी पट्टी साथ ले आना। क्योंकि जो किस्सा मैं आज सुनाने जा रहा हूं, वो सुनकर चाय तो गले से उतरेगी नहीं, हां… कानों से धुआं जरूर उठने लगेगा!”
अब देखो जनाब, एक पहाड़ी देश है – बड़ा सुंदर, बड़ा शांत, पर अंदर से पूरा उबालदार प्रेशर कुकर! उसी देश की एक रियासत में बसी है एक शानदार घुड़साल। सालों तक सब बढ़िया, घोड़े खुश, कर्मचारी मस्त – सब चल रहा था जैसे दादी के हाथ की खिचड़ी… लेकिन फिर आ गए एक ‘साहब’ – जिनकी नजरें जहां पड़ती हैं, वहां शुरू हो जातें हैं तमाशे!
इन साहब को एक दिन ख्याल आया – “क्यों न इस घुड़साल की जिम्मेदारी सौंप दी जाए एक पूर्व विवादित बहुत बड़े सैन्य कमांडर के होनहार सुपुत्र को?” फिर वही हुआ, कमान ‘बेटे’ साहब को मिल गई, जिस दिन ‘बेटा साहब’ ने कमान संभाली, उसी दिन से घुड़साल में घोड़ों ने हिनहिनाना छोड़कर हांफना शुरू कर दिया। गाली-गलौज डांट-फटकार का माहौल हो गया।
कर्मचारी तो बेचारे खौफ में ऐसे गायब हुए कि लगता था घुड़साल नहीं, कोई हॉरर शो चल रहा है। ‘बेटे साहब’ की आवाज़ सुनते ही लोग दीवारों में घुसने की कोशिश करते हैं, और घोड़े… बंधे होने के कारण घुस नहीं सकते, बस आंखों में पानी भरकर आहें भरते हैं।
अब सोचो, जिस रियासत में बड़े-बड़े साहबों के बंगले और आफिस हैं, एक बड़ा खुफिया विभाग भी है जहां हर दूसरा आदमी खुद को ‘देश का जेम्स बॉन्ड’ समझता है, वहां ये सब खुलेआम हो रहा है… बड़ा गंभीर सवाल तो यह है कि आखिर क्यों अबतक सर्वोच्च कमांडर या बाकी बड़े कमांडरों तक यह खबर पहुंची नही! या फिर सब जानकर वह भी शांत हैं! जैसे कोई मुंह में ‘चना’ डालकर बैठा हो।
हां, वही ‘चना’ जिसके बारे में दबी जुबान में चर्चा है – कि यहां चने भी गोलमाल हो रहे हैं। जैसे कुछ साल पहले ‘चारा’ घोटाला हुआ था, अब लगता है ‘चना’ घोटाला भी दस्तक दे रहा है। जांच तो बनती है, वरना कहीं ऐसा न हो अगली बार इन घोड़ों को भी R.. डालनी पड़े।
अब सोचो विनोद, एक पहाड़ी देश की खाकी सेना का ये हाल हो गया है – आदमी तो आदमी, अब तो बेजुबान भी बेहाल हैं। क्या यही है वो ‘नया मिजाज’ जहां घोड़े तक लाइन में लगकर इंसाफ मांग रहे हैं?
तो चलो, चाय खत्म करते हैं… लेकिन कहानी नहीं। क्योंकि अगली बार शायद ये ‘चना’ किसी और सिस्टम के दांतों में फंसा मिले।
