उत्तराखंड

चौपाल की चुस्की: रसूखदार मधुशाला का धमाल

आशीष सुना रहा है विनोद को कहानी,
भैया, यहाँ हम तुम्हें अपनी कहानी सुनाने के लिए चाय पिलाते-पिलाते थक गए और वहां एक पहाड़ी देश की एक ‘रसूखदार मधुशाला‘ के लिए तलवारें खींच गई हैं।
(“चाय की चुस्की और नॉक-आउट वार्तालाप – क्या मजा है!”)

क्या गजबे कहानी है विनोद –
की एक पहाड़ी देश की राजधानी में एक नामी ‘रसूखदार मधुशाला’ है, भैया, वहाँ देर रात तक ऊंची आवाज में कान फोड़ू संगीत बजता तो है, मगर कुछ ‘खास’ लोगों को वो मधुर संगीत सा लगता है क्योंकि उनकी जेबों में उस ‘रसूखदार मधुशाला’ का ‘मधु’ जो समय पर पहुंच जाता है।
(“बिलकुल वैसे ही जैसे कि हमारी चाय में स्वाद है और टाइमिंग कमाल!”)

इतना ही नहीं भैया विनोद –
एक दिन की बात है, हम देर रात एक पहाड़ी देश की उस रियासत को घूमे निकले तो देखा कि कंही खाकी सैनिक दिखाई नही दिए…
लेकिन जैसे ही हम ‘रसूखदार मधुशाला’ के सामने पहुंचे तो देखा कि खाकी सैनिक पूरी तत्परता से वहाँ सब मैनेज कर रहे हैं…
देर रात बिल्कुल सुनसनियत में भी कान फोड़ू आवाज और हो हल्ला उन्हें सुनाई नहीं दे रहा…
(“यहाँ तो लगता है, सैनिक भी चुपचाप ‘म्यूट’ मोड में चल पड़े हों, और सबकी नजरें मधु की ड्यूटी पर!”)

अब हम काम में नारद जी के वंशज हैं – तो भैया, लग गए खोजबीन करने में, तो पता चला कि यह यूँ ही नहीं है ‘रसूखदार मधुशाला’, बल्कि बड़े-बड़े साहब लोगों का अड्डा है।
दबी जुबान, चर्चा भी आम है कि अड्डे से कुछ ज्यादा है…
(“वो चर्चाएं, जैसे मसालेदार चटनी – हर निवाले में कुछ तो झलकता है!”)

अब यह हुआ कि एक दिन रियासत के ‘सर्वेसर्वा’, ‘रसूखदार मधुशाला’ से नाराज हो गए।
आनन-फानन में कार्रवाई की तैयारी हुई और तैयारी भी ऐसी कि किसी दूसरे अधिकारियों को भनक तक नहीं लगी – मतलब, खाकी से लेकर खुफिया को ही नहीं, अपने ऊपर के भी कुछ लोगों को साहब ने गच्चा दे दिया और हवा तक नहीं लगने दी।
साहब के एक्शन से ‘रसूखदार मधुशाला’ का रसूख चकनाचूर हो गया, मधुशाला पर ताला लगा गया, लेकिन भैया, यह तो शुरुआत थी…फिर शुरू हुआ असली खेल…दिखाया रसूख, तरह-तरह की चर्चाएं चली, स्पष्टीकरण भी आये…

खेल चल ही रहा था कि एक और साहब की एंट्री हो गई, ‘रसूखदार मधुशाला’ ने दिखाया दम – सीज करने के आदेश के खिलाफ ले आए खोलने का आदेश…
(“यहाँ तो ‘सर्वे सर्वा की फटकार और मधुशाला की टक्कर, जैसे दो तीखी मिर्चें एक ही थाली में!”)

समझे विनोद, कि एक बेचारा गरीब तो न्याय के लिए धक्के खाता रहता है, मगर ‘रसूखदार’ तो रियासत के ‘सर्वे सर्वा”को भी दिखा देता है रसूख का आईना…
अब देखते हैं कि आगे क्या होगा – क्या अब भी पहले जैसे धड़ल्ले से नियमों को ताक पर रखकर चलता है ‘रसूखदार मधुशाला’?

क्या मधु में है दम या फिर अधिकारी पड़ेगा भारी…
(“आओ देखे ये नाटक – चाय के साथ तीखा व्यंग, जहाँ हर वार में छुपा है असली मजा!”)

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